" भगत सिंह विचार माला " by V.C.
(9)
यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी-7-यशपाल
( क्रांतिकारी और महान कथाकार स्व.यशपाल)
आजाद को अच्छी-अच्छी पुस्तकें लाकर साथियों
को पढ़ाने का बहुत शौक था परंतु उपन्यास या यौन विषय (सेक्स) संबंधी पुस्तकें देखकर
उन्हें बहुत ही चिढ़ उठती थी। ब्रह्मचर्य का एक बहुत रूढ़िवादी आदर्श उस समय तक आजाद
के मस्तिष्क में था। उससे पहले दो-एक दफे दल में ऐसे कांड हो चुके थे कि साथियों ने
नारी के आकर्षण के कारण अपने कर्तव्य में निर्बलता दिखाई थी। आजाद को नारी,
प्रेम और सौंदर्य की चर्चा से ही चिढ़ हो गई थी। कसरत स्वयं करने और दूसरों
को कराने का भी शौक था। यदि कोई और काम न हो तो आजाद का मन लगातार बातचीत करने से या
हवाई पिस्तौल ले कर किसी बारीक चीज पर निशाने का अभ्यास करते रहने से बहलता था।
उस समय आजाद और दूसरे साथियों की ब्रह्मचर्य, नारी
और सौन्दर्य के बारे में कैसी धारणायें थीं, यह दो-एक बहुत छोटे-छोटे
उदाहरणों से स्पष्ट हो जायेगा। प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप में स्त्री का प्रसंग चलते
ही आजाद एतराज किये बिना न रह सकते थे- ''फिर 'चुम्बक' की बात। यह साला 'चुम्बक'
जिसे लगा ले डूबा। सिपाही को औरत से क्या मतलब '' उस समय ऐसी धारणा केवल आजाद की थी। दूसरे साथियों को स्त्री और प्रेम की चर्चा
से कोई परहेज नहीं था। हां, सुखदेव भी इस प्रसंग में कम ही रस
लेता था परंतु आदर्श की दृष्टि से कोई विरोध न था। उसका कहना था-'जब औरत है नहीं तो उस की चर्चा से क्या फायदा।'
आजाद का सब से प्रिय गाना था-'मां हमें विदा
दो, जाते हैं हम विजयकेतु फहराने आज।' वे
प्राय: ही भगत सिंह या राजगुरु और बाद में बच्चन (वैशम्पायन) से यह गाना सुनाने के
लिए अनुरोध करते। राजगुरु यों तो धीर स्वभाव था परंतु चुटकियां लेने में उसे मजा आता।
जब आजाद उसे गाने के लिए कहें तो वह जरूर ही कोई इश्किया गजल गुनगुनाने की चेष्टा करने
लगता। यह गजलें वह प्राय: भगत सिंह से सुन कर याद कर लेता था। भगत सिंह को शायरी से
भी बहुत शौक था। महाराष्ट्रीय होने के कारण राजगुरु का उर्दू उच्चारण बहुत विचित्र
था। गजल में वह आशिक और 'माशूक' को प्राय:
ही 'आशुक' और 'माशिक'
कह जाता और खूब हंसता। यदि आजाद 'विजयकेतु'
वाला गाना सुनने पर जिद्द ही करें तो वह हंस कर उत्तर देता-'अभी पुलिस आता है विजयकेतु लेकर।'
एक रोज राजगुरु कहीं से बहुत सुंदर स्त्री की तस्वीर का एक कैलेण्डर ले आया
और लाकर 'नाई की मंडी' आगरा वाले मकान में दीवार पर लटका दिया। आजाद कहीं बाहर से लौटे। बच्चन (वैशम्पायन)
ने उस कैलेंडर की और संकेत किया-''भैया, देखा! यह कौन ले आया है?''
आजाद ने कैलेंडर की ओर देखा। माथे पर बल पड़ गए।
कैलेंडर को कील समेत दीवार से
खींच लिया और फाड़ कर फेंक दिया।
कुछ देर बाद राजगुरु लौटा। दीवार से अपना कैलेंडर गायब देखकर वह ऊंचे स्वर में
पुकार उठा-''अरे, हमारे कैलेंडर का क्या हुआ?''
बच्चन ने ओंठ दबाकर फर्श पर पड़े कैलेंडर के टुकड़ों की ओर देखा। राजगुरु ने झुंझलाहट
और क्रोध के स्वर में प्रश्न किया-''यह किस ने
किया?'' ''हमने किया।''
आजाद भला किसी से डरते थे।
आजाद के प्रति आदर से स्वर को कुछ धीमा कर राजगुरु ने विरोध किया-''आपने क्यों फाड़ डाला? हम इतने शौक से तस्वीर लाये थे।''
''हमें-तुम्हें ऐसी तस्वीरों से क्या मतलब?'' आजाद ने डपट दिया।
''वाह, इतनी खूबसूरत तस्वीर थी।''
''हमें-तुम्हें खूबसूरत से मतलब?'' नाराजगी
से ऊंचे स्वर में
आजाद ने डांटा।
''तो जो कुछ खूबसूरत होगा उसे फाड़ डालोगे, तोड़ डालोगे?''
राजगुरु भी अड़ गया।
''हां तोड़ डालेंगे?'' आजाद ने सीना तान
लिया।
''तो जाकर ताजमहल को भी तोड़ डालो'' राजगुरु
ने चुनौती दी।
''हां तोड़ डालेंगे, जब हमारा बस चलेगा।''
आजाद की आंखों में सुर्ख डोरे उभर आए।
दूसरे साथियों को होंठ दबाये, आंखें चुराते
देख कर राजगुरु की झल्लाहट भी मुस्कराहट में बदल गई।
ब्रह्मचर्य के विषय में 1929 के आरंभ में आजाद की ऐसी ही धारणा थी परंतु एक
ही वर्ष में उन का दृष्टिकोण बहुत ही स्वाभाविक और यथार्थवादी हो गया था। अनाचार और
उच्छृंखलता से तो आजाद को सदा ही घृणा रही परंतु 1930 के जाड़ों की बात मुझे याद है
कि कानपुर के 'चुन्नीगंज' मुहल्ले में आजाद मुझ से बात किया करते थे कि क्रांति को जीवन भर का काम बना
लेने वाले आदमी को क्रांतिकारी स्त्री से विवाह कर लेना चाहिए। कभी मजे में आकर सम्भावित
पत्नी का जिक्र करते हुए कल्पना किया करते थे:
''...पहाड़-पहाड़ घूम रहे हों, एक राइफल उसके
कंधे पर हो
और एक हमारे कंधे पर। दुश्मन
से घिर जायें। वह राइफलें भरती जाए और हम दनादन-दनादन गोली चलाते जायें।''(क्रमशः)
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