गुरुवार, 14 जुलाई 2016

इसलिए राह संघर्ष की  हम चुनें,
जिंदगी आंसुओं में नहाई न हो.
शाम सहमी न हो, रात हो न डरी,
भोर की आँख फिर, डबडबायी न हो.
सूर्य पर बादलों का न पहरा रहे,
रौशनी, रोशनाई में डूबी न हो.
आस्मां में टंगी हो न खुशहालियाँ,
क़ैद महलों में सबकी कमाई न हो.
हो किसी के लिए मखमली बिस्तरा,
और किसी के लिए, एक चटाई न हो.
अब तमन्नाएं फिर न करें ख़ुदकुशी,
ख़वाब पर खौफ की चौकसी न हो.
दम न तोड़े कहीं भूख से बचपना,
रोटियों के लिए अब लड़ाई न हो...

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

लाहौर नेशनल कॉलेज में भगत सिंह -छबीलदास

लाहौर नेशनल कॉलेज में भगत सिंह -छबीलदास


भगत सिंह जहां एक जोशीला इंकलाबी था वह एक बहुत अच्छा विद्यार्थी भी था। उसके अध्यापक होने के नाते मैं यह बात दावे से कह सकता हूं कि उसे पढ़ाने में बहुत आनन्द आता था। भगत सिंह को पढ़ने का बेहद शौक था। जब किसी भी किताब का नाम उसके सामने लिया गया तो उसने फौरन उसे पढ़ने की फरमाइश की। वैसे तो भगत सिंह ने न जाने इतिहास की कितनी ही किताबें पढ़ डाली होंगी लेकिन मुझे अभी तक याद है कि उसे जो किताब सबसे ज्यादा पसंद थी वह 'क्राइ फॉर जस्टिस' थी। भगत सिंह ने लाल पेंसिल से इस किताब के बहुत हिस्सों पर निशान लगाए थे। इनसे पता चलता था कि उसके हृदय में बेइन्साफी के खिलाफ लड़ने की भावना किस तरह कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह पुस्तक लाजपतराय भवन लाहौर में हमारे घर में वर्षों तक रही। स्वयं मेरे बच्चों विजय, सन्तोष और मनोरमा ने कई बार इस किताब को लेकर मुझसे ढेरों सवाल पूछे। मेरे बच्चे भी यह जानना चाहते थे कि भगत सिंह को कौन-सी किताब पसंद थी और क्यों ?

भगत सिंह को पढ़ने की आदत तो इतनी प्रबल थी कि जिस दिन उसे फांसी लगाई गई उस दिन भी वह अपने नियमानुसार किताब पढ़ने में मगन था। तो स्वयं उन दिनों जेल में था लेकिन जेल ही से मिलने वाली रिपोर्टों से पता चलता था कि जिस दिन भगत सिंह को फांसी लगनी थी उस दिन उसके चेहरे पर परेशानी और गम की कोई झलक दिखाई नहीं पड़ती थी। जब वार्डन ने उससे आकर तैयार होने को कहा कि जेल के नियमों के अनुसार हर कैदी को बाकायदा नहा-धोकर कपड़े बदलवाकर और उसकी कोई अंतिम इच्छा हो तो उसे पूरी करके फांसी के तख्ते पर ले जाया जाता है, कहते हैं भगत सिंह ने हंसते-हंसते यही कहा था कि भाई पहले मुझे अपनी किताब तो पूरी कर लेने दो। भगत सिंह उस समय लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। एक नौजवान जो जानता था कि कुछ ही घंटे बाद उसे फांसी के तख्ते पर लटकाया जाना है अगर अपनी कोई प्रिय पुस्तक पढ़ने में मगन रहे तो उससे यही अन्दाजा लगाया जा सकता है कि वह सचमुच एक अनोखे इरादे का व्यक्ति होगा।

मैंने नेशनल कॉलेज में और बाहर भी भगत सिंह को हमेशा हंसते हुए देखा। लेकिन उस हंसी के पीछे भी उसका पक्का इरादा और अपने मकसद को पूरा करने की भावना झलकती थी। लगता था कि भगत सिंह को जीवन के सांसारिक बंधनों से गहरी चिढ़ थी इसलिए उसने कभी शादी करवाने की हामी नहीं भरी। बहुत साल बाद भगत सिंह की माताजी उसके विषय में बातचीत करते हुए बताती थीं कि वह हमेशा हंसकर यही कहता था- बेबे तुम परेशान न हुआ करो, तुम्हारे लिए एक अनोखी दुल्हन ब्याह कर लाऊंगा। भगत सिंह का मतलब हिंदुस्तान की आजादी से था। जब भगत सिंह की मां श्रीमती विद्यावती फांसी लगने से कुछ दिन पहले अपने बेटे से मिलने गईं तब भी वह जोरों से हंस रहा था और मां को दिलासा दिलाने के लिए बार-बार यही कहता कि भारत को जल्दी ही आजादी मिलेगी और उसे तो खुशी होनी चाहिए कि उसका बेटा किसी मकसद के लिए मरने जा रहा है। लोग तो बीमारियों से भी मरते हैं। लेकिन कितने खुश किस्मत ऐसे हैं जिन्हें देशभक्ति और वतनपरस्ती के इल्जाम में फांसी का तख्ता नसीब होता है।

भगत सिंह को विश्वास था कि शादी का बंधन इंकलाब के रास्ते में बहुत भारी रुकावट है। मुझे याद है एक बार लाहौर में दरिया रावी में मैं और भगत सिंह कश्ती की सैर कर रहे थे, मेरी तरह भगत सिंह को भी दरिया में कश्ती की सैर का बहुत शौक था। उस वक्त शाम का अंधेरा होने ही वाला था। भगत सिंह ने हंसते हुए मुझसे पूछा-'गुरुजी सुना है आप शादी कर रहे हैं? क्या यह खबर ठीक है' जब मैंने कहा, 'हां' तो भगत सिंह एकदम से कहने लगा 'फिर इंकलाब कैसे आएगा? आप घर गृहस्थी में पड़ जाएंगे या मुझ जैसे नौजवानों को इंकलाब का सबक पढ़ायेंगे? मैंने महसूस किया भगत सिंह को मेरी शादी करने का फैसला पसंद नहीं आया।

मैंने भगत सिंह को बताया कि मैं जिस लड़की से शादी कर रहा 
हूं वह कोई मामूली लड़की नहीं है बल्कि स्वयं एक आदर्शवादी और क्रांतिकारी विचारों के व्यक्ति की बेटी है। मुझे प्रसन्नता है कि स्वतंत्रता संग्राम में लड़ने के लिए मुझे एक सहयोगी और मिल गया है। मेरा वह जवाब सुनकर भगत सिंह हंसने लगा लेकिन मुझे उस समय ही यह एहसास हो गया था कि भगत सिंह को मेरे जवाब से सन्तोष नहीं हुआ था। वह यही सोच रहा था कि उसके गुरुजी ने अपनी जिंदगी का यह गलत फैसला किया था।

लेकिन मेरी पत्नी सीता देवी ने जिस तरह सक्रियता से स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, बार-बार जेल यात्रा की और आजादी मिल जाने के बाद भी उन्होंने महिलाओं व मजदूरों के अधिकारों के संघर्ष को अपना मकसद बनाये रखा था, उसने हमेशा मुझे यही एहसास दिया कि चाहे भगत सिंह को मेरा फैसला कितना भी नापसंद था लेकिन मेरा फैसला गलत नहीं था।

हमारे सौभाग्य में जिन दिनों देश भर में महात्मा गांधी तथा स्वराज्य आंदोलन की लहर मची हुई थी, उन्हीं दिनों विदेशी विशेषत: आयरलैंड तथा सोवियत रूस से धड़ाधड़ राजनीतिक लिटरेचर, किताबें, टेक्स्ट, अखबारों और मैग्जीनों का आना शुरू हो गया था। आयरिश लिटरेचर तो केवल यही नारा लगाता था कि किसी भी देश अथवा जाति को आजादी प्राप्त करने के लिए बन्दूकों, पिस्तौलों, बमों तथा हवाई जहाजों की भारी जरूरत होती है। भारत में अंग्रेजी शासन अपनी फौजों तथा छावनियों से सशस्त्रा सैनिकों तथा टैंकों द्वारा स्थापित हुआ है और अब तक चल रहा है। बाइबिल में स्पष्ट घोषणा दी गयी है कि 'इफ यू हैव फेथ इन द सोर्ड, बाई द सोर्ड यू शैल बी पनिश्ड' अर्थात् यदि तुम तलवारों और बंदूकों द्वारा किसी को गुलाम बनाते हो तो समय और अवसर आने पर वही लोग तुमसे अधिक तेजतर शस्त्रों व बंदूकों से तुम्हें अपने हाथ से धकेल कर बाहर करेंगे। अत: यदि सचमुच ही भारत की जनता अपनी दासता का जुआ अपनी गरदन से उतार फेंकना चाहती है तो किसी न किसी ढंग से अणु शस्त्र प्राप्त करे। वे साधन बेग-बारो-स्टील अर्थात् कहीं से मांगकर, उधार लेकर अथवा जबर्दस्ती कहीं से चुराकर अथवा लूटकर प्राप्त करे ।

हमारा दूसरा पड़ोसी देश जो हमें धड़ाधड़ अपना साहित्य भेज रहा था वह था सोवियत रूस जिसने 1917 में देश के किसानों तथा मजदूरों के बलबूते पर अपने देश में किसानों और मजदूरों का शासन स्थापित कर लिया था और सदियों की तानाशाही के जुए को अपनी गर्दन से उतार फेंका। नौजवान भारत सभा के एक दल ने आयरिश ढंग को अपनाकर और अस्त्र जमा करके अपना काम शुरू कर दिया। भारत की सेंट्रल असेंबली के अधिवेशन में बम फेंककर बहरे कान को सुनाने के लिए ऊंची आवाज की जरूरत होती है वाले पोस्टर भी फेंके थे। फिर उन्होंने हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के समीप ही मद्रास से लौटते हुए वायसराय की ट्रेन पर बम चलाने का प्रोग्राम भी पूरा किया। फिर पंजाब के बड़े-बड़े शहरों जैसे लाहौर, अमृतसर, गुंजरांवाला, लायलपुर और रावलपिंडी आदि में एक ही दिन एक ही समय में बम चलाने का कार्य पूरा किया। राजधानी दिल्ली के चांदनी चौक बाजार में लार्ड हार्डिंग वायसराय के जलूस वाले हाथी पर भी बम चला दिया जिसमें हाथी का महावत तथा उसका लड़का तत्काल ही दम तोड़ गए। लेडी हार्डिंग की गर्दन पर छह इंच गहरा जख्म लगा और लार्ड हार्डिगं स्वयं बेहोश हो गए। बंगला में कुछ पोस्टर भी फेंके जिसमें लिखा था कि हम अंग्रेज हुकूमत को सचेत करना चाहते हैं कि अंग्रेजी शासन के विरोधी तथा शत्रु केवल बंगाल एवं कलकत्ता में ही नहीं बसते। अब वे भारत में जिस भाग में भी कदम रखेंगे वहीं अपने शत्रु तथा जानलेवा मौजूद पायेंगे।

आजादी का साहित्य तैयार करने वालों तथा नौजवान भारत सभा में कांगड़े वाले लेखक रामचंद्र और मिंटगुमरी के मेहता सत्यपाल इत्यादि सम्मिलित थे। जिन्होंने दो-दो पैसे वाले टैक्स्ट उर्दू भाषा में हजारों की संख्या में छापकर पंजाब के गांव-गांव व कोने-कोने में बांटना और बेचना शुरू कर दिया। हमारा सबसे प्रथम टैक्स्ट भारतमाता के दर्शन अर्थात् हम स्वराज्य क्यों चाहते हैं था। टैक्स्टों के प्रकाशन का प्रोत्साहन फ्रांस की राज्य क्रांति के जन्मदाता वाल्टेयर से लिया गया था। मैंने अपने टैक्स्ट के दूसरे पृष्ठ पर प्रकाशन के शीर्षक में वाल्टेयर का वह ऐतिहासिक वाक्य लिखा कि दस-दस, बीस-बीस जिल्दों वाली हजारों पृष्ठों की मोटी-मोटी किताबों को भला कौन खरीद सकता है और उसे पढ़ और समझ भी कौन सकता है। सच्ची बात तो यह है कि यह गरीब से गरीब किसान और मजदूरों की झोंपडियों तक पहुंच सकने वाले पैसे दो-दो पैसे वाले टैक्स्ट ही होते हैं जिनसे सल्तनतों के तख्ते उलट जाया करते हैं। प्रेस का मालिक मेरा एक मुसलमान दोस्त था। यह वाक्य पढ़कर वह मुझसे पूछने लगे कि आप भी अंग्रेजी राज्य का तख्ता उलटना चाहते हैं?

मैंने जवाब दिया जनाब यह वाक्य मेरा नहीं है बल्कि एक फ्रेंच 
विद्वान तथा फिलॉसफर वाल्टेयर का है। आप तो मुसलमान हैं और आपने फारसी की वह मिसाल नहीं सुनी है कि नकले कुफ्र-कफ्र न बासद अर्थात् कुफ्र के शब्दों को दोहराना कुफ्र नहीं होता। हमारी कचहरियों में ऐसे भी मुकदमे पेश होते हैं जहां एक आदमी जज के सामने पेश होकर कहता है कि अमुख आदमी ने मुझे बहुत ही गंदी गाली दी है और जज के सामने वह आदमी उस गंदी गाली के शब्दों को दोहरा देता है तो वह उसे अपराध नहीं समझता। प्रेस का वह मालिक मेरी बात सुनकर हंस पड़ा और मेरे टैक्स्ट की पांडुलिपि अपने हाथ मैं लेकर बोला जनाब में इसे अवश्य ही छाप दूंगा। इसके बाद तो वह टैक्स्ट तथा मेरे लिखे हुए दर्जनों टैक्स्ट हजारों की संख्या में छपते रहे और चलते रहे।

जब ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी लगाने का फैसला किया तो उस वक्त मैं मुल्तान जेल में था। लेकिन जिस दिन यानी 23 मार्च को भगत सिंह को फांसी लगाई गई तो जेल से रिहा होकर देहरादून अपनी पत्नी और बच्ची विजय को मिलने गया हुआ था। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी का समाचार मेरे जैसे बहुत से लोगों के लिए बेहद दुख का समाचार था। सारे पंजाब में सनसनी और दुख की लहर फैल गई थी। उस दिन शायद कुछ टोडियों को छोड़कर किसी घर में चूल्हा नहीं जला था। सारा पंजाब मातम में डूबा हुआ था। औरतें सिसक-सिसक कर रो रहीं थीं। अंग्रेज सरकार ने इस भय से कि अगर उन्होंने इन तीनों शहीदों की लाशें उनके रिश्तेदारों के हवाले कर दीं तो कहीं पंजाब में और उसके साथ ही सारे हिंदुस्तान में तूफान खड़ा हो जाए, इन तीनों की लाशों को रात के अंधेरे में सतलुज नदी के किनारे फिरोजपुर के नजदीक एक स्थान पर मिट्टी का तेल डालकर जला दिया। जो क्रांतिकारी जीते हुए ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए भारी आतंक और चुनौती बने हुए थे उनकी लाशों से जैसे पूरा ब्रिटिश साम्राज्यवाद भयभीत था।
   यह प्रश्न भी वाद-विवाद का रहा है कि गांधीजी की अहिंसा और असहयोग आंदोलनों में लाहौर तथा पंजाब के लोगों की प्रतिक्रिया कैसी रही ? पंजाब मुस्लिम, हिंदू और सिख संप्रदायों में विभाजित था। मुसलमान पचास प्रतिशत से ज्यादा थे। उनका कांग्रेस और कांग्रेसियों के साथ कोई नाता नहीं था। हिंदू संप्रदाय सनातन धर्म और आर्यसमाजियों में बंटा हुआ था। आर्यसमाज भी गुरुकुल पार्टी और कॉलिज पार्टी में बंटी हुई थी। हर संस्था की अपनी-अपनी समस्याएं थीं। इसलिए कोई भी पूरी तरह से आंदोलन की ओर आकर्षित नहीं हुआ। सिखों में भी एक वफादार ग्रुप था जो हमेशा ब्रिटिश सेना को जवान सप्लाई करने में गर्व अनुभव करता था। बंगाल, यू.पी. और दक्षिणी भारत के मुकाबले में पंजाब में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की प्रतिक्रिया बहुत कम और कमजोर रही। पंजाब सांप्रदायिक रूप से विभाजित था। और लोग आपस में खींचातानी करते रहते हैं।
   पंजाब में कांग्रेस शक्तिशाली नहीं थी। विशेष रूप से शहरी 
इलाकों में कांग्रेस का प्रभाव कम था। गांवों में सिखों की एक संख्या कांग्रेस में शामिल हुई लेकिन उसकाकारण उनमें राजनैतिक चेतना उत्पंन होना नहीं बल्कि गुरुद्वारों में सुधार लाने की इच्छा थी। शहरी इलाकों में नाम की कांग्रेस कमेटियां तो बनी थीं लेकिन गांवों में वह भी नहीं थीं। पंजाब में लोग सार्वजनिक मीटिंगों में शामिल होते थे जब कोई बड़े लीडर किसी अन्य राज्य से लाहौर तथा पंजाब के किसी शहर में आते थे। लेकिन उनकी हिदायतों की कोई व्यावहारिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दी।
   'क्राई फॉर जस्टिस' के अलावा भगत सिंह की प्रिय पुस्तकें थीं 
डॉन ब्रीन लिखित 'माई फाइट फॉर आयरिश फ्रीडम' और 'हीरोस और हीरोइन्स आफ रशिया'। भगत सिंह ने मुझे भी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में शामिल होने के लिए कहा। मैंने उसे कहा 'मैंने सर्वेंट्स आफ पीपुल्स सोसायटी के आजीवन सदस्य बनते हुए जो प्रतिज्ञा की है उसके अंतर्गत मैं हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में शामिल नहीं हो सकता।' मैंने उससे कहा कि मैंने आपकी संस्था के और नियम पढ़े हैं। मैं जानता हूं कि आपके तीन नियम हैं, शस्त्रा और असलह को जमा करना, उसका उचित अवसर पर इस्तेमाल करना और सारे देश में साम्राज्यवाद विरोधी प्रोपेगैंडा करना। मैंने भगत सिंह से पूछा था कि क्या तुम जानते हो कि मैं आजकल क्या काम कर रहा हूं? मैं आजकल किताबें और पैम्पलेट लिख रहा हूं और जगह-जगह लेक्चर दे रहा हूं।
   यह सुनकर भगत सिंह ने कहा, 'गुरुजी मैं संतुष्ट हूं।' मैंने भगत सिंह से कहा। 'मैं तुम्हें आश्वासन दिलाता हूं कि तुम्हारी हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में औपचारिक रूप से प्रवेश किए बिना भी मैं ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरूध्द अपने प्रोपेगैंडा को दुगना कर दूंगा ताकि लोग तुम्हारी संस्था और तुम्हारी कार्रवाही को सही मानें।'
   नेहरू म्यूजियम नई दिल्ली के लिए ली गई एक इन्टरव्यू में मुझसे पूछा गया कि मेरे यह छात्रा जिनमें भगत सिंह भी शामिल था मुझसे एक अध्यापक होने के नाते प्रेरणा लेते होंगे?
   मैंने तब भी अपने उत्तर में कहा था कि हर अध्यापक अपने शिष्यों को किसी न किसी तरह से प्रेरणा जरूर देता है और प्रभावित करता है। लेकिन विद्यार्थी भी अपने अध्यापकों को प्रभावित करते हैं और प्रेरणा देते हैं। मैं यह बात बहुत प्रसन्नता और दावे के साथ कहता हूं कि भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, भगवतीचरण तथा नेशनल कॉलेज में मेरे अन्य विद्यार्थियों ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
   जहां तक भगत सिंह का स्वभाव है उसकी प्रेरणा का बहुत बड़ा
 स्रोत स्वयं उसका अपना परिवार था। उसके पिता सरदार किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह महान देशभक्त थे जिन्होंने अपना सारा जीवन भारत की स्वतंत्राता के लिए अर्पण कर दिया और बहुत मुसीबतें उठायीं। भगत सिंह अपने चाचा सरदार अजीत सिंह के बहुत भारी प्रशंसक थे और औरसंख्या कांग्रेस में शामिल हुई लेकिन उसका उन्हें अपना आदर्श मानकर उनकी इज्जत करते थे।

क्रांतिकारी भगत सिंह को तो बस देश की आजादी की ही लग्न थी। क्रांति ही उसका धर्म था और वह किसी और देवी देवता में विश्वास नहीं रखता था। भगत सिंह मुझसे हर राजनैतिक विषय पर बातचीत करता था। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की गतिविधियों की बातें वह मुझसे नहीं करता था। क्योंकि वह सभी गुप्त कार्रवाहियां थीं। जो आर्मीयों के सदस्यों के बीच की बातें थीं। मैं हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का सदस्य नहीं था। जब भी हम असहयोग आंदोलन की प्रगति और गांधी के विषय में बातचीत करते तो भगत सिंह उत्तेजित होकर गांधीजी की आलोचना करता। गांधीजी के प्रति भगत सिंह का रवैय्या सुभाषचंद्र बोस की तरह था। सुभाषचंद्र बोस ने गांधी जी से कहा था-''बापू, आइये हम वही भाषा सीखें जो अंग्रेज समझते हैं। अहिंसा और जुर्म सहने की फिलोस्फी अंग्रेजों की समझ में नहीं आ सकती। उनका साम्राज्य ताकत के सहारे टिका हुआ है। हमारे पास भी अगर वैसे ही हथियार हों तो नि:सन्देह हमारी विजय होगी। अंग्रेज चार करोड़ हैं और हम चालीस करोड़ हैं।'' भगत सिंह भी इसी तरह का दृष्टिकोण रखता था।
भगत सिंह के साथ मेरी अंतिम भेंट जनवरी के प्रथम सप्ताह 1929 
में कलकत्ता में हुई। वह अप्रैल 1929 को गिरफ्तार कर लिया गया था। भगत सिंह ने अपने केश कटवा दिए थे। वह कोट-पैंट और हैट पहनता था। मैं भी कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने गया हुआ था। भगत सिंह से मेरी मुलाकात कांग्रेस अधिवेशन में नहीं बल्कि एक दोस्त के घर हुई थी। उनका नाम सेठ छज्जूराम था। सेठ छज्जूराम एक बिजनेस मैन थे। उनके घर पंजाब के बहुत लोग आकर ठहरते भी थे। भगत सिंह वहीं ठहरा हुआ था। मैं पोर्टिको में खड़ा था। भगत सिंह तेजी से आया और सीढ़ियों के रास्ते ऊपर चला गया।
   उस समय मेरी भगत सिंह से बातचीत नहीं हुई। हमने एक दूसरे

 की ओर देखा। उसने मुझे नमस्ते की और वह गायब हो गया।
   उसके बाद भगवतीचरण मेरे पास आए और कहने लगे 'गुरुजी, आपने भगत सिंह को देख लिया है। कृपया यह रहस्य किसी को न बतायें कि आपने उसे कलकत्ता में देखा था।' मुझे समझ में आ गया कि क्या बात थी। भगवतीचरण, भगत सिंह से पढ़ाई में एक साल सीनियर था।
   लाहौर में भगत सिंह, सुखदेव और भगवतीचरण अक्सर मेरे कमरे में आया करते थे। साथ ही गुसलखाना था जिसमें वे नहाते थे। वे अपने कोट-और दूसरे कपड़े गुसलखाने के बाहर ही टांग देते थे। मैंने अक्सर उनकी कपड़ों की जेबों में पिस्तौलों को रखे देखा था। मुझे बहुत से लोगों से पता चला कि हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की शाखाएं बंगाल,बिहार और उत्तरप्रदेश में थीं। दिल्ली और महाराष्ट्र में भी उनका प्रभाव था ।राजगुरू तो महाराष्ट्र के रहने वाले थे।







शनिवार, 2 अप्रैल 2016

मैं तो एक मुश्ते गुबार हूं...- बटुकेश्वर दत्त

मैं तो एक मुश्ते गुबार हूं...- बटुकेश्वर दत्त


सरदार की गुनगुनाहट आज भी मेरे कानों से टकरा रही है- मैं तो एक मुश्ते-गुबार हूं... धोकर निचोड़े गए कपड़ों को झटके दे देकर जैसे वह धूप में फैला रहा हो और पूरी तन्मयता के साथ गुनगुना रहा हो।कानपुर स्थित सुरेश दादा के मेस की दूसरी मंजिल की छत पर किशोर सरदार के कपड़े धोने का दृश्य अब भी उसी तरह अम्लान है-कंधे सहित सिर पर लिपटा केश-गुच्छ, कमर में एक कच्छा छोड़कर पूरा नंगा बदन, जल की धार पर वह लगातार कपड़े पटक रहा है। साबुन के शुभ्र फेन उड़-उड़कर इधर-उधर फैल रहे हैं। मैं बगल में बैठा अन्य कपड़ों पर साबुन घिस रहा हूं और सरदार बार-बार वही एक पंक्ति दुहराये जा रहा है-मैं तो...

सन् उन्नीस सौ चौबीस के शुरू का कोई महीना। मैं उन दिनों कानपुर के बंगाली मिडिल स्कूल का विद्यार्थी और पारिवारिक अनुशासन की आंखें बचाकर क्रांतिकारी दल की शाखा का एक सक्रिय कार्यकर्त्ता। श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के समाचार पत्र 'प्रताप' से सम्बध्द, दल के प्रमुख नेता श्री सुरेशचंद्र के निर्देशानुसार एक शाम उनसे मिलने कम्पनी बाग गया। क्यों और किसलिए बुलाया गया था, यह पूछना दलीय अनुशासन के विरुध्द था और आदेश पर आंख मूंदकर चलना ही हमारे विप्लवी जीवन का प्रथम पाठ। इसलिए हर तरह की परिस्थिति के प्रति अपने को तैयार कर समय से वहां पहुंचा। सुरेश दादा नहीं थे। बाग के एक छोर से दूसरे तक मेरी चंचल निगाहें ढूंढ़ गयीं, पर कहीं पर भी वह नजर नहीं आया। मुझे आश्चर्य हुआ क्रांतिकारियों के कार्यक्रम में इस तरह की भूल पहले कभी देखने को नहीं मिली थी। घनघोर अंधेरी रात में भी मूसलाधार वर्षा सिर पर झेलते हुए, सीआईडी की निगाहें बचाता निर्दिष्ट कार्य के लिए ठीक जगह निर्धारित समय पर हाजिरी बजाने में इसके पहले मुझसे कभी भूल नहीं हुई थी। फिर आज प्रमुख क्रांतिकारी नेता के निर्देश और कार्य में यह अंतर क्यों?

इसी उधेड़बुन में पड़ा था कि मेरी आंखें एक घनी, कांटेदार झाड़ी से जाकर उलझ गयीं। क्या ही अजीब, रोंगटे खड़े कर देने के साथ-साथ हंसाने वाला दृश्य! झाड़ी केऊपर एक सफेद पगड़ी का सिरा लगातार दायें से बायें और बायें से दायें मोर की पखी की तरह डोल रहा था। मैं नजर गड़ाये उसे देखता रहा। बीच-बीच में वह स्थिर हो जाता और फिर घड़ी के पेंडुलम की तरह अपनी चाल पकड़ लेता। बाग के निस्तब्ध वातावरण में, जबकि संध्या का रक्तिम प्रकाश रात के अंधेरे में अपना मुंह छिपाने की तैयारी कर रहा हो, कांटेदार झाड़ी के ऊपर से सफेद पगड़ी का वह हिलता सिरा इशारे से जैसे मुझे अपने पास बुला रहा था। मैं आगे बढ़ा। झाड़ी के समीप पहुंचते ही उस सफेद पगड़ी का अधिकारी साढ़े पांच फुट से भी लंबा एक सिख युवक मेरी आहट पर उछलकर खड़ा हो गया। उसकी काली चमकती आंखों में शंका की भावना और लम्बी लटकती दोनों भुजाओं पर कमीज के चढ़े आस्तीन, दृढ़ मुट्ठियों में बंद लंबी उंगलियां, दोनों गालों पर दाढ़ी की हल्की रेखा, सिर पर पगड़ी में कैद केश-गुच्छ, जिसकी कुछ लटें बाहर झूल रहीं थीं। मेरे सामने वह सिख युवक चैलेंज का भाव चेहरे पर लिए खड़ा था और मैं उसकी तात्कालिक मुद्रा के प्रति उदासीन, कि तभी बगल में निश्चल गिरिराज की भांति बैठे विप्लवी सुरेश दादा पर ध्यान गया। मुझे देखकर उनके चेहरे पर चिर-परिचित मुस्कराहट खेल गयी और सरदार शांत पड़ा। उसकी दृढ़ मुट्ठियों की उंगलियां सहज और शिथिल हुई। मुझ नवागंतुक को देखते ही जो चमक और खून उसकी आंखों में उतर आया था, सुरेश दादा की मुस्कराहट से जैसे पूरे चेहरे पर लालिमा बन फैल गया और मुझे लगा अपनी अनावश्यक दृढ़ता के लिए वह कुछ झेप-सा रहा है। सुरेश दादा ने हंसते हुए हम दोनों को आमने-सामने बैठाया और उस तरुण सरदार से मेरा परिचय कराया नाम- बलवंत सिंह पंजाब के नेशलनल कालेज में बीए के छात्रा हैं। प्रमुख क्रांतिकारी नेता रासबिहारी बोस निकटतम सहयोगी शचींद्रनाथ सान्याल 'बंदी जीवन' के लेखक एवं बाद में काकौरी षड़यंत्रा के प्रमुख अभियुक्त उस समय उत्तरी भारत में क्रांतिकारी दल के प्रमुख संगठनकर्त्ता थे। पंजाब नेशनल कालेज के अध्यापक श्री जयचंद्र विद्यालंकार की मार्फत शचींद्र दादा से उस सिख नवयुवक का परिचय हुआ और वह क्रमश:विप्लवी संगठन में खिंच आया। उसकी क्रांतिकारी विचारधारा देखते हुए परिवार के लोग छात्रावस्था में ही उसका विवाह कर देने का निर्णय कर चुके थे, लेकिन क्रांतिपथ के पथिक उस तरुण को अपने विवाह का प्रस्ताव मंजूर नहीं था और उसी से मुक्ति पाने के लिए तमाम पारिवारिक आत्मीयता एवं परिवार के लोगों से संबंध-विच्छेद कर वह लाहौर से सुरेश दादा के आश्रय में कानपुर भाग आया था। रूसी विप्लवियों का प्रभाव उसकी स्मृतियों में था और उन्हीं की तरह उसने भी शपथ ले रखी थी कि जीवन में न किसी से प्रेम करेगा, न किसी का प्रेम-पात्र बनेगा, न विवाह करेगा, न किसी का विवाह रचायेगा। उससे संबंधित ये तमाम बातें मुझे धीरे-धीरे बाद में मालूम हुईं जब अपने पहले परिचय के बाद प्रत्येक दिन, प्रत्येक घड़ी हम एक-दूसरे के करीब आते गए। और उसी वर्ष यानी 1924 में ही! जीवनदायनी गंगा का प्रलयंकारी प्लावन! दोनों तटों पर बसे कानपुर शहर के साथ-साथ अनगिनत गांव उस प्लावन के शिकार हुए थे। प्लावन के शिकार ग्रामवासियों ने वृक्ष की ऊंची डाल पर आश्रय लिया। बहते हुए लोगों को सहारा देने के लिए गंगा पुल पर मोटी-मोटी रस्सियां बांधकर लटकायी गयीं थीं, ताकि धारा के साथ बहते हुए लोग उन रस्सियों को पकड़कर अपने प्राण बचा सकें। शहर में बाढ़ पीड़ितों की सेवा के लिए कैम्प डाले गएं। 'तरुण संघ' नाम की एक संस्था काम कर रही थी और हमें भी सेवा दल में काम करने की पुकार मिली। बाढ़ से क्षतिग्रस्त लोगों की सेवा में मैं जुट गया। बलवंत सिंह साथ था। घर के अनुशासन की उपेक्षा कर किसी सार्वजनिक सेवा कार्य के लिए घर छोड़ दिन-रात काम करने का मेरा वह पहला मौका था। बलवंत का नाता घर से पहले ही टूट चुका था, इसलिए उसे किसी तरह के पारिवारिक अनुशासन की चिंता थी नहीं। सेवा कार्य में जुट जाना उसके लिए अनायास था जबकि उसी काम के लिए मेरे किशोर मन ने घर के विरुध्द पहली दफा विद्रोह का रास्ता अपनाया।

हम दोनों की डयूटी प्राय: एक साथ ही पड़ती। रात में हम दोनों गंगा के अंधेरे तट पर खड़े होकर हाथों में जलती लालटेन लिए शून्य में अविराम हिलाया करते ताकि प्लावन की तीक्ष्ण धारा में बहते हुए मनुष्य-मवेशी अंधेरी रात में किनारे का संकेत पा सकें और जब कभी मवेशियों का कोई झुंड उस रोशनी के सहारे हमारे पैरों के पास पहुंच जाता, हम उसे बाहर निकालते, फिर उसे रखने की व्यवस्था की जाती थी।

दिन के समय हम दोनों मल्लाहों के साथ निकलते और बाढ़ग्रस्त निराश्रित परिवारों को उनकी बची हुई सामग्री के साथ नाव पर लादकर गंगा तट के कैम्पों में पहुंचाते किशोर सरदार का हृदय यह सब देख-देखकर पसीजता रहता और उसकी आंखों में उस वक्त एक अव्यक्त-सी करुणा समायी होती थी। शहर के पास ही कल्याणपुर के बाढ़ पीड़ित कैम्प का वह दृश्य आज भी मेरी आंखो में सुरक्षित है। बाढ़ की प्रलंयकारी लीला में सबकुछ गंवा कर हताश, भूखे-असहाय लोगों का वह हुजूम! उनकी हृदय वेधी चीख पुकार से पूरा इलाका गूंज रहा था। भोजन की प्रतीक्षा करते स्त्री-पुरुष अलग-अलग कतारों में पत्तल के सामने बैठे थे कि तभी गर्म पूड़ियों की टोकरी दोनों हाथों से ऊपर उठाये तरुण सरदार दिखाई पड़ा। सिर पर सफेद रेशमी पगड़ी, बदन में साधारण कपड़े की कमीज जिसकी दोनों आस्तीनें ऊपर चढ़ी थीं। मुझसे आंखें मिलते ही उसके होठों पर स्वत: स्फूर्त मुस्कान एवं आंखों में चमक कौंध उठी, लेकिन बातचीत का समय कहां।वह उत्साह एवं उमंग के साथ भूख से बेचैन लोगों की कतार की तरफ बढ़ गया।

बाढ़ पीड़ितों की सहायता-सेवा के उस दौर ने हम दोनों को एक-दूसरे के करीब लाने में काफी मदद की। उस दिन क्षुधित, सर्वहारा जनों के बीच पूड़ियां बांटने का सरदार का अंदाज, काम के प्रति उसकी लगन एवं निष्ठा आज भी मैं नहीं भूल पा रहा हूं। पूड़ियां परोसने वाले उसके हाथों ने बाद के क्रांतिकारी जीवन में उसी निष्ठा के साथ पिस्तौल या बम भी चलाये। उस रोज किसे मालुम था कि परवर्ती क्रांतिकारी जीवन में हमें अति साधारण भोजन भी नियमित रूप से नसीब न होगा या यह कि पूड़ियां परोसने वाले उन हाथों पर सूखी रोटी और नमक ही शेष जीवन के आधार होगें।

उन दिनों हम दोनों के किशोर जीवन में एक-दूसरे के प्रति आकर्षण भाव के साथ-साथ जो सबसे बड़ा आकर्षण था, वह शहर (कानपुर) के पास कनालफाल के समीप गंगा के तट पर बैठ उसकी सुषमा को अनवरत निरखते रहना और बीच-बीच में किसी विषय, किसी बात या योजना पर परस्पर विचार-विमर्श करना। इसी सिलसिले में अकसर हम क्रांतिकारी जीवन के आने वाले दिनों की कल्पना में तल्लीन हो जाया करते। प्रसिध्द क्रांतिकारी जीवनियों या क्रांति से संबंधित साहित्य का पाठ हम यहीं बैठकर किया करते। एक ओर गंगा की अश्वेत जलधारा गरज के साथ लगातार आगे की ओर बढ़ती और दूसरी ओर क्रांतिकारी साहित्य का प्रभाव हमारी किशोर रंगों में खून की रफ्तार बढ़ा जाता। पानी का प्रचंड वेग एवं उसकी अथक गतिशीलता की छाप हमारे ऊपर सर्वाधिक पड़ी और शायद इसीलिए गंगा के तट का आकर्षण हम दोनों के मन में सदैव बना रहा।

एक शाम हम गंगा के तट पर बैठे अपनी क्रांति संबंधी कल्पनाओं को अमली जामा पहनाने के तरीकों पर विचार-विमर्श कर रहे थे कि अचानक ही आकाश काले बादलों से पटने लगा। गंगा पार की बस्तियां धुधली पड़ने लगीं, हवा का वेग बढ़ गया और थोड़ी ही देर में बादलों की भीषण गड़गड़ाहट से लगा आसमान फट जायेगा। क्षण भर में ही प्रकृति ने भयंकर रूप धारण कर लिया था। इससे पहले कि हम उठकर वहां से शहर की ओर चल देते, बूंदाबांदी शुरू हो गयी थी और शहर के फूलबाग स्थिति 'एडवर्ड मेमोरियल हॉल' पहुंचते-पहुंचते जमकर वर्षा होने लगी थी। यहां आकर हमें मालूम हुआ कि साथ की बहुमूल्य पुस्तक 'हीरो एंड हीरोइन ऑफ रशिया' तो हम जल्दबाजी में गंगा किनारे ही छोड़ आए हैं। रूस पर जारतन्त्र के विरुध्द रूसी युवक-युवतियों के सशस्त्र संग्राम की वह इतिहास-पुस्तक दुर्लभ होने के कारण हमारे लिए बहुत ज्यादा मूल्यवान थी, लेकिन उस घने अंधकार में वर्षा के साथ प्रचंड वायु का वेग सम्भालता हुआ दो मील का रास्ता तय करके उसे लाये कौन। मेरे जाने की बात सरदार को नागवार सी लगी। शरीर में वह मुझसे निश्चित रूप से तगड़ा था और अपने उसी तगड़ेपन की दलील देकर उस वक्त उसने मुझे जाने से रोक दिया और खुद लम्बी डग भरता हुआ अंधेरे में गुम हो गया।उसे जाते हुए कुछ ही क्षण गुजरे होंगे कि मेरी भावुकता ने मुझे झिंझोड़ा और मैं भी उस बीहड़ अंधकार में सरदार के पीछे हो गया। घने अंधकार में बेतहाशा भागते मेरे पैरों को अपने भागने का अहसास तब हुआ जब वे बीच सड़क पर बैठे सरदार से टकराये। सिर की रेशमी पगड़ी आधी खुलकर कीचड़ में सनी थी, एक हाथ से पुस्तक एवं दूसरे से अपने पैर का अंगूठा थामे वह लथपथ पड़ा था। पैर के अंगूठे का नाखून उखड़ गया था। पगड़ी चीरकर मैंने पट्टी बांधी और उसे सहारा देकर सुरेश दा के मेस भीगते हुए वापस आया। उससे अलग अपने घर लौटकर मेरा मन सरदार के दुख से बेचैन था। मैं वहां से रूई-पट्टी, जैम्बक की डिबिया लेकर उसी मूसलाधार वर्षा में सरदार के पास पहुंचा, उसके अंगूठे का खून साफ कर उस पर मरहम पट्टी की और रात भर उसके पास बैठा रहा। सुबह होते ही घर के अनुशासन की सुधि आयी। उस दिन परिवार से मिलने वाली तमाम यंत्राणाएं मैं धैर्यपूर्वक सह गया सिर्फ इस तसल्ली पर कि अपने प्रिय मित्र के प्रति अपना छोटा-सा कर्त्तव्य निभाया। और सरदार का वह स्नेहयुक्त आवेश- 'पीओ, देर न करो। तुम्हें पीना ही पडेग़ा। दूध वाले की दुकान के सामने गर्म दूध से भरा गिलास लिए वह मुझे आदेश दे रहा है। दूध से उन दिनों अरुचि नहीं थी लेकिन भरपेट भोजन के बाद पक्का आधा सेर दूध चढ़ा जाना मेरे पेट के लिए मुश्किल था। आज भी दिल्ली और आगरा स्थित दूध की दुकानों के दृश्य मेरी आंखों के सामने आ जाते हैं। उन्हीं दुकानों के मालिक बाद में हमारी उपस्थिति दिल्ली और आगरा में सिध्द करने के लिए हमारे मुकदमों में आए थे।

दरअसल, भोजन के बाद गर्मागर्म दूध का गिलास चढ़ा जाने का पाठ मुझे सरदार ने ही दिया। जब कभी पैसा पास होता वह दूध पीने के विलास से नहीं चूकता था। जहां रोटी का लुकमा भी निश्चित न हो वहां दुग्धपान विलास की ही श्रेणी में आएगा न? और उसे सिर्फ तीन पाव गर्मागर्म दूध से ही संतोष नहीं था बल्कि गिलास के दूध पर कम-से-कम डेढ़ छटांक मोटी मलाई का टुकड़ा भी अलग से पड़ना चाहिए। मलाई न रहने पर घी का तडका (छोंक) वह गर्म दूध में दे लेता था। शरीर में खून बढ़ाने का उसका यही उपयुक्त नुस्खा था। दूध के प्रति एक असीम आसक्ति उसके मन में थी। स्वास्थ्य के प्रति वह कभी उदासीन न रहा, हालांकि बाद के पार्टी जीवन में नियमित रूप से हमें भोजन भी नसीब नहीं हुआ। विप्लवी जीवन की अनिश्चित परिस्थिति एवं जीवन-धारण के लिए सीमित साधन और व्यवस्था के अभाव में भी वह शरीर और स्वास्थ्य के प्रति हमेशा सचेत रहा। यद्यपि जीवन के प्रति उसके मन में जबरदस्त आसक्ति थी, तथापि उसका कहना था कि जीवन जब अधिक सुंदर और प्रिय मालूम पड़ने लगे, तभी अपने आदर्श के लिए उसे बलिदान करना चाहिए।

संस्मरण की इस कड़ी के रूप में एक और दृश्य मेरी आंखों के सामने अब भी कौंध जाता है...

कानपुर स्टेशन का जन-प्लावित प्लेटफार्म, 'जो बोले सो निहाल.... सत्श्री ..अ...का....ल...' के गगनभेदी नारे से दिग-दिगंत गूंज उठा है। गुरु के बाग के सत्याग्रही सिख मोर्चा डालने के लिए पंजाब जा रहे हैं। उन दिनों हर स्टेशन पर, जहां ट्रेन रुकती थी, अधीर जनता सत्याग्रहियों के दर्शनार्थ टूट पड़ती थी। प्रत्येक स्टेशन पर वीर सत्याग्रहियों को भोजन कराने के लिए लंगर खोले गए थे। कानपुर स्टेशन पर भी ऐसी ही व्यवस्था थी और सत्याग्रहियों की एक झलक लेने के लिए जनता उमड़ पड़ी थी। फूलों और फूल-मालाओं की वर्षा! मैं भी स्टेशन गया था। अपार जनसमूह के बेग को ठेलकर सत्याग्रहियों के डिब्बों तक न पहुंच पाने की मजबूरी में ओवर-ब्रिज पर जाकर खड़ा हो गया और असंख्य सिरों से पटे प्लेटफार्म का दृश्य वहीं से देखने में तल्लीन था कि भीड़ को चीरती मेरी दृष्टि अपने सरदार मित्र पर पड़ी वही रेशमी पगड़ी और सफेद कमीज दोनों आस्तीनें बांह पर चढ़ी हुईं । एक हाथ में शरबत की बाल्टी और दूसरे में लंबा-सा गिलास। अपने कंधों से भीड़ को ठेलता हुआ वह सत्याग्रहियों के हाथों में शरबत के गिलास पकड़ा रहा था। भीड़ की खींचातानी में पगड़ी सिर से खिसककर कंधें पर लटक आई है जिसकी चिंता उसे नहीं थी। कम-से-कम समय में ज्यादा-से-ज्यादा सत्याग्रहियों की प्यास बुझा पाने की व्यग्रता उसके चेहरे, आंख और चाल में स्पष्ट देखी जा सकती थी। ट्रेन के एक सिरे से दूसरे सिरे तक उसकी विश्रामहीन भाग-दौड़! मेरे प्रिय साथी सरदार का यह एक और रूप था।

थोड़ी देर ठहरने के बाद ट्रेन चल पड़ी। फिर एक बार सत्श्री अकाल के नारे से आकाश गूंजा और कोलाहल मुखरित स्टेशन का प्लेटफार्म खाली होना शुरू हो गया। भीड़ पिघलने लगी। जो सत्याग्रहियों को देखने, उनसे मिलने-मिलाने आए थे, बाहर कीओर खिसकने लगे और बच गया हाथों में गिलास-बाल्टी लिए मेरा वह सरदार मित्र! मैं ओवर-ब्रिज से उतर उसकी बगल में खड़ा हुआ पर उसे जैसे किसी बात की सुध नहीं थी। ट्रेन जाने की दिशा में मंत्रमुग्ध आंखों में उदासी लिए अब भी वह खाली पटरी देखे जा रहा था। अपने कंधे पर मेरे हाथ का दबाव महसूस कर मुड़ा और मुस्कराकर एक हाथ से मेरे पंजे को दबाया बोटू ...। उसकी आंखों में कोई अदृश्य निर्णय कौंध उठा था उस घड़ी।

उस दिन लगभग गुमसुम और उदास वह जनशून्य स्टेशन से मेरे साथ बाहर हुआ था और फिर वह दिन भी आया जब दल के आदेशों पर उसे कानपुर, 'प्रताप', सुरेश दादा और मुझे छोड़कर एक छोटे स्कूल का हेडमास्टर बनकर अन्यत्र जाना पड़ा। विप्लव दल के नियमानुसार कुतूहलवश जरूरत से ज्यादा किसी का परिचय प्राप्त करना हमारे लिए मना था और सरदार शायद सब दिन ऐसा अनुभव करता रहा था कि कोई रहस्य वह अपने एकमात्र एवं अनन्य साथी मुझसे छिपाता रहा है, वरना कानपुर से विदाई लेने के दिन ही क्या खुलता। शिक्षक का पद ग्रहण करने जाते वक्त मुझसे मिलने आया था और हमारी आत्मीय घनिष्टता के बावजूद दल की मर्यादा रखने के लिए अब वह जिस रहस्य को छिपाये हुए था, विदाई के क्षण उसे व्यक्त किये बगैर न रह सका। जिस तरुण बलवंत सिंह के स्नेहपाश में मैं अब तक बंधा था, वही सरदार भगत सिंह के रूप में मुझसे विदा ले गया।

यही उसका असली परिचय था लोगों ने उसे बाद में विप्लवी सरदार भगत सिंह के रूप में जाना, लेकिन मेरे लिए तो वह सब दिन मानवीय गुण-सम्पन्न, भाव में गम्भीर भावुकता से ओतप्रोत बलवंत सिंह बना रहा। बाद की हमारी मैत्री परवर्ती क्रांतिकाल में एक-दूसरे के साथ सहयोगी की भूमिका, उसकी फांसी से लेकर मेरे जलावतन तक का प्रसंग इस कड़ी की अगली कहानी है।

सन् उन्नीस सौ सत्ताईस-अट्ठाईस का समय हमारे राष्ट्रीय जीवन में क्रांति के साथ-साथ संकट का काल भी कहा जा सकता है क्योंकि उन्हीं दिनों हमारी आजादी की लड़ाई का स्रोत एक नये रास्ते की ओर प्रवाहित हुआ। उस वक्त तक देशवासी क्रांतिकारी आंदोलन और उसकी विचारधाराओं से ज्यादा परिचित नहीं थे और अंग्रेज सरकार क्रांतिकारियों को साधारण खूनियों तथा डकैतों की श्रेणी में डालकर देश की जनता को सब दिन गुमराह करने का प्रयत्न करती रही थी। ब्रिटिश सरकार का यह कहना था कि विप्लवी देश में संत्रास एवं अराजकता फैलाना चाहते हैं जबकि विप्लवी देश में परिवर्तन के प्रति आग्रही थे। जनसाधारण को विप्लवी के प्रति जागरुक बनाकरआर्थिक परिवर्तनों द्वारा शोषणविहीन समाज की स्थापना ही उनका लक्ष्य था। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए यह जरूरी था कि क्रांतिकारियों की ओर से देशवासियों के सम्मुख एक निश्चित कार्यक्रम पेश किया जाए और देश के नेताओं को असेंबली भवन के भीतर वैधानिक कार्यक्रमों के दांव-पेच से मुक्त कर जनांदोलन के प्रति उत्साहित किया जाए, दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में अंग्रेज सरकार की ओर से भारत के लिए स्वायत्ता शासन की मांग बार-बार ठुकरा दी गयी थी। जन नेताओं के लाख विरोध के बावजूद यहां की जनता के मानवीय अधिकारों को विलुप्त करने के लिए केंद्रीय धारा सभा से टे्रड डिस्प्यूट बिल स्वीकृत करा लिया गया था। कानून स्वीकृत हो जाने के फलस्वरूप देश के करोड़ों भूखे-मेहनतकश लोग अपनी आर्थिक दशा सुधारने के प्रारंभिक स्वत्व एवं एकमात्र उपाय हड़ताल से वंचित कर दिए गए थे।
     केंद्रीय विधानसभा में हमारे जन-प्रतिनिधियों के उस अपमान और उस अमानुषिक बर्बरतापूर्ण कानून द्वारा देश की करोडों ज़नता पर जो हमला हुआ था उसी के विरोध में भारतीय क्रांतिकारी संस्था 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' द्वारा केंद्रीय असेंबली के सभाकक्ष में बम डालकर गोरी हुकूमत को एक चेतावनी देने के सुझाव पर आगरा हेड क्वार्टर में आलोचना गोष्ठी की बैठक चल रही थी। असेंबली में बम डालकर आत्मसमर्पण करना एवं बाद में मुकदमे के दौरान अभियुक्त के कटघरे में खड़े होकर भारतीय क्रांतिकारी दल की ओर से विप्लवियों के विचारों, आदर्शों एवं उद्देश्यों का दिग्गर्शन कराने के लिए एक विशद राजनीतिक वक्तव्य देने की सूझ सरदार भगत सिंह के मस्तिष्क की ही उपज थी। लेकिन इसे निभाये कौन? यानी केंद्रीय असेंबली में बमफेंकने जैसा जोखिम भरा कार्य कौन करे? इसे पूरा करने का सीधा एवं साफ अर्थ था मृत्यु! लाख सावधानी के बावजूद असेंबली भवन के फर्श पर बम फटने के साथ किसी की मृत्यु की सम्भावना स्पष्ट थी और उसके बाद वहां नियुक्त सुरक्षा पुलिस या सार्जेंट द्वारा बम फेंकने वाले को तुरंत मौत के घाट उतार देना भी लगभग निश्चित ही था। बावजूद इसके कि हम सभी क्रांतिकारी देश को स्वतंत्र कराने की बलिदानी भावना से प्रेरित हो, प्रियजनों से नाता तोड़, किसी भी क्षण मृत्यु का आलिंगन करने का संकल्प ले, सिर पर कफन बांध, गृह-त्यागी बनकर निकल पड़े थे, फिर भी विचार गोष्ठी में बैठकर अपनी-अपनी सुरक्षा पर नजर गड़ाये दूसरे साथी को निश्चित मौत का फरमान सुनाना किसी के लिए भी संभव न था। ऐसा कोई व्यवहार किसी के भी मन को संदिग्ध बना सकता था। सरदार ने सहर्ष आगे बढ़कर निश्चित मौत से खेलने का बीड़ा उठाया, साथ-साथ मैंने भी। वर्षों पहले कानपुर में गंगा के किनारे बैठे-बैठे जिन अनागत दिनों की कल्पनाएं हम बार-बार किया करते थे, कि एक साथ ही दोनों देश की स्वतंत्राता के लिए आत्माहुति देंगे, उसे साकार करने का समय आ गया था...

हम दोनों- सरदार और मैं- बम के साथ आगरे से दिल्ली पहुंचे। लगभग महीने भर तक दिल्ली में ही टिके रहे। मैं हाफ पैंट, कमीज और जूता पहनता था और सरदार फ्लैट हैट लगाने लगे थे। प्रत्येक संध्या बम को अखबार में ढंककर कोट की नीचे वाली जेब में रखे हम साथ-साथ असेंबली भवन जाते, वहां का वातावरण परखते, पहरे पर संतरियों की गतिविधि देखते और अनुमान लगाते-कैसे अपने उद्देश्यों में सफल हो सकेंगें।

इसी बीच एक दिन सरदार ने साथ-साथ फोटो खिंचवाने की बात रखी। कुछ देर तो मैं टालता रहा, लेकिन सरदार जब जिद पर उतर आए तब मुझे भी झुकना पड़ा, और वही एकमात्रा तस्वीर हम दोनों की आखिरी यादगार बनकर रह गयी।

फिर आया वह दिन जिसके लिए हम आगरे से चलकर दिल्ली आए थे और लगातार महीने भर तक बिना नागा असेंबली भवन के अगल-बगल चक्कर लगाते रहे थे। यानी 8 अप्रैल, 1928। दिन के ग्यारह बजे स्थान केंद्रीय असेंबली हॉल जिसे अब संसद कहा जाता है। ट्रेड डिस्प्यूट बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल पर जनमत जानने के लिए प्रस्ताव स्वीकृत हो गया था। अध्यक्ष की कुर्सी पर सरदार बल्लभ भाई पटेल विराजमान थे। ट्रेजरी बेंचों पर सर जेम्स क्रेरर एवं सर जार्ज शुस्टर। विशिष्ट व्यक्ति के रूप में वायसराय की सीट पर, दर्शक दीर्घा में, सर जान साइमन।
      सरकारी बैंचों के सामने विरोधी सीट पर पंडित मोतीलाल नेहरू, पंडित मदनमोहन मालवीय एवं डा. मुंजे आदि। बम हम दोनों ही की जेब में थे। ऊपर से पीछे की खाली बैंचों को लक्ष्य करके हमने बम फेंके। जोरों का धमाका हुआ, लेकिन चूंकि किसी को मारने का इरादा तो था नहीं, इसीलिए कमजोर बम बनाये गए थे ताकि धमाके पैदा करने के अलावा और किसी तरह का भयंकर, घातक या मारक प्रभाव उससे पैदा न हो सके। 'इंकलाब जिंदाबाद' एवं 'साम्राज्यवादी शासकों के बहरें (राष्ट्रीय मांगों के प्रति) कानों को खोलने के लिए जोरदार आवाज की जरूरत है' के नारों एवं फटे बम के धुएं से हॉल भर गया और भगदड़ मच गयी। डर के मारे सर जेम्स क्रेरर बैंचों के नीचे जा छिपे। बम के साथ फेंके गए लाल रंग के छपे पर्चें धुएं की सतह पर हॉल में इधर-उधर तैर रहे थे।
        उस पर्चें में गोरी हुकूमत की आंखें खोलने के लिए भारतीय क्रांतिकारी दल के उद्देश्यों का स्पष्ट हवाला दिया गया था-'दो नगण्य इकाइयां (सरदार भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्ता) को कुचलने से राष्ट्र नहीं दबेगा... सरकार इस बात को समझे कि पब्लिक सेफ्टी तथा ट्रेड डिस्प्यूट बिल एवं लाला लाजपत राय की निर्मम हत्या के विरुध्द जनमानस का विरोध प्रदर्शित करने के अतिरिक्त हम इतिहास को भी यह साक्ष्य देना चाहतेहैं कि व्यक्तियों का दमन करना आसान है, लेकिन विचारधाराओं का दमन नहीं किया जा सकता। विशाल साम्राज्य नष्ट हो जाते हैं लेकिन विचारधारा नष्ट नहीं होतीं। बोरबोन और जार का पतन हो गया, किंतु क्रांतिकारी आगे बढ़ते गए, हमें, जिनको मनुष्य जीवन से प्रेम है और जो एक बड़े ही गौरवमय भविष्य की कल्पना करते हैं, व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्राता के लिए बाध्य होकर मानव-रक्त बहाना पड़ रहा है यह आवश्यक है क्योंकि जो मनुष्यता के लिए शहीद होते हैं, उनके त्याग से क्रांति की वह वेदी बनती है जहां से मानव द्वारा मानव के शोषण का अंत हो सकेगा-इंकलाब जिंदाबाद'

अपनी पूर्व योजनाओं के अनुसार एवं मार्शल लॉ जारी न हो या बम फेंकने के अपराध में निर्दोष व्यक्ति न पकड़ लिए जायें, हम दोनों ही ने आत्मसमर्पण कर दिया। तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन ने उस घटना का तात्पर्य अच्छी तरह समझा और बम विस्फोट के बाद ही व्यवस्थापिका सभाओं के संयुक्त अधिवेशन में भाषण के समय चर्चा करते हुए बताया कि बमों का यह प्रकार किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि एक संस्था (अंग्रेजी शासन) पर किया गया है।

हम दोनों को दिल्ली के दो अलग-अलग थाना में रखा गया। मुकदमे शुरू हुए फिर हमारा स्थानान्तरण दिल्ली जेल में हुआ जहां एक साथ सटी दो अलग-अलग कोठरियों में हमें रखा गया। बीच में खड़ी अभेद्य दीवार। नियाज अली हमारा जेल वार्डन था जिसे एक अरसे तक हम हाड़-मांस का न होकर पत्थर का बना समझते रहे। नियाज अली ने कभी मुझे और सरदार को एक साथ न होने दिया। स्पर्शानुभूति की बात तो दूर रही, उसने कभी हम दोनों को एक-दूसरे का चेहरा तक नहीं देखने दिया, उन दो-चार दिनों को छोड़कर जबकि इकट्ठे हमें अदालत ले जाया जाता था। दिल्ली की उस विशेष अदालत में न्यायाधीश के सामने प्रविष्ट होते समय अपने-अपने हाथ-पांवों में पड़ी बेड़ियां की झंकार के साथ हम 'क्रांति चिरंजीवी हो' का नारा लगाते। पूरा न्यायालय गूंज उठता था, और तभी से यह नारा राष्ट्रीय जीवन में व्याप्त हो गया। बम विस्फोट के साथ पहले-पहल सरदार के मुंह से निकली 'इंकलाब जिंदाबाद' की घोषणा जैसे पूरे राष्ट्रीय जनजीवन में व्याप्त हो गयी।

मुकदमे के दौरान न्यायाधीश महोदय ने सरदार से 'क्रांति' शब्द की व्याख्या करने को कहा तो सरदार ने बताया- 'क्रांति या विप्लव खून-खच्चर ही का रास्ता नहीं, और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिशोध का कोई स्थान है। बम और पिस्तौल ही क्रांति का धर्म हो, ऐसा भी नहीं है। क्रांति से हमारा मतलब है कि वर्तमान समाज और शासन व्यवस्था जो स्पष्टत: अन्याय एवं अत्याचारों पर आधारित है, परिवर्तित हो। आप पूर्ण परिवर्तन के द्वारा ऐसी व्यवस्था की स्थापना करें जिसमें सर्वसाधारण की सत्ता कायम हो सके।'

आसिफ अली साहब ने हमारी ओर से वकालत की थी और हमारे गवाह बने थे डॉ. मुंजे एवं पंडित मदनमोहन मालवीय। न्यायालय ने हम दोनों को आजीवन काले पानी की सजा दी। 1930 में 'लाहौर षडयंत्र केस' के अंत में जब मैं सदा के लिए सरदार से बिछुड़कर मुलतान जेल भेज दिया गया, तब सरदार ने मेरी बहन को एक पत्र लिखा था जो आज भी मेरे जीवन की अमूल्य निधि है। 17 जुलाई, 1930 को लाहौर सेंट्रल जेल से लिखा गया वह पत्र सरदार के व्यथातुर हृदय की अभिव्यक्ति हैं-'बटुक की जुदाई आज मेरे लिए असह्य हो रही है। इस बिछोह से मैं एकदम स्तब्ध सा हो गया हूं... एक-एक पल मेरे लिए असह्य भार बन गया है। सचमुच, अपने भाई एवं परिजनों से भी ज्यादा प्रिय उस मित्र से अलग हो जाना आज मेरे लिए अत्यन्त ही कठिन गुजर रहा है...हमें सबकुछ धैर्यपूर्वक सहन करना है और आपसे भी हिम्मत के साथ परिस्थिति का सामना करने का अनुरोध करूंगा ।'

'लाहौर षडयंत्र केस' में जब सरदार को फांसी की सजा का फैसला सुनाया गया तब अपने एक पत्र में उसने मुझे लिखा:

'प्रिय बटुक,

दीर्घकाल तक हम लोगों का विचार-प्रहसन चलने के बाद अब उस पर यवनिका पात हुआ। न्यायाधीशों ने सजाएं घोषित कर दी हैं और उन सजाओं की इत्तला हमें भेज दी गयी है। मुझे फांसी की सजा मिली है।
तुम्हें मालूम है कि मैं लाहौर जेल की उन्हीं फांसी की कोठरियों में हूं, जहां चंद रोज पहले तुम मेरे साथ थे। इन फांसी की कोठरियों में कुल पैंतालीस मृत्यु-दंड प्राप्त बंदी हैं जो प्रतिक्षण अपनी अंतिम घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे अभागे बन्दी फांसी के फंदे से छूट पाने के लिए दिन-रात भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं। उनमें से अधिकांश अपने कृत्यकर्म के लिए अत्यंत ही अनुलप्त हैं और इन अभागे बन्दियों के बीच मैं ही एक ऐसा व्यक्ति हूं, भगवान के बदले अपने आदर्शों में ही जिसकी अविचल आस्था है, एवं जिस आस्था के लिए मैं मृत्यु का आलिंगन करने जा रहा हूं, इसके लिए संतुष्ट हूं। तुमसे मेरा बिछोह अत्यंत ही पीड़ादायक है, लेकिन इससे कुछ विशेष उद्देश्यों की पूर्ति होगी। मैं फांसी के तख्ते पर अपना प्राण विसर्जित कर दुनिया को दिखाऊंगा कि क्रांतिकारी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खुशी-खुशी आत्म-बलिदान कर सकता है। मैं तो मर जाऊंगा, लेकिन तुम आजीवन कारावास की सजा भुगतने के लिए जीवित रहोगे और मेरा दृढ़विश्वास है कि तुम यह सिध्द कर सकोगे कि विप्लवी अपने उद्देश्यों के लिए आजीवन तिल-तिल कर यंत्राणाएं सहन कर सकता है। मृत्यु दंड पाने से तुम बचे हो और मिलने वाली यंत्राणाओं को सहन करते हुए दिखा सकोगे कि फांसी का फंदा, जिसके आलिंगन के लिए मैं तैयार बैठा हूं, यंत्रणाओं से बच निकलने का एक उपाय नहीं है। जीवित रहकर विप्लवी जीवन भर मुसीबतें झेलने की दृढ़ता रखते हैं।
                                          तुम्हारा-भगत सिंह'

सरदार अपने विचारों या व्यवहारों में कट्टरपंथी कभी नहीं रहे मस्तक पर सिख धर्म के द्योतक लंबे बाल, कंघा, कच्छा और कड़ा लेकर वह कानपुर आए थे, लेकिन बाद के दिनों में परिस्थिति के अनुसार उन्होंने खुद को दूसरे रूप में ढाल दिया। लंबे-लंबे बाल कटवाकर नीचे से ऊपर तक सूट एवं हैट से लैस उन्होंने अंग्रेज साहबों का रूप धारण किया। हिंसा एवं अहिंसा की उधेड़बुन में उनके विचार उलझे हुए नहीं थे, न ही उनके मन में कभी किसी के प्रति हिंसा या द्वेष पनपा। राजनीतिक बंदियों को युध्दबंदी (प्रिजनर ऑफ बार) की स्वीकृति दिलाने एवं तदनुसार उनके सम्मानपूर्वक व्यवहार की मांग पर बंदियों द्वारा सामूहिक अनशन का संग्राम आरम्भ करना तथा उसी संग्राम के द्वारा देश की मुरझाई हुई चेतना में फिर से स्पंदन जगाने की कल्पना सरदार ने ही की थी और उसी संग्राम के फलस्वरूप पूरे देश में एक अभूतपूर्व परिस्थिति उत्पन्न हुई एवं बाद में 1930 का जनांदोलन जिससे प्रेरित हुआ। खुद सरदार ने जेल के भीतर 14 जून, 1929 से प्रारंभ करके लगातार 127 दिनों तक भूख की अनन्त ज्वाला में घुलते हुए मौत की प्रतीक्षा की थी...

गंभीर मननशीलता, राजनीतिक दूरदर्शिता एवं आत्मबल पर अटूट विश्वास सरदार के अन्य गुण थे। दूसरे देश के क्रांतिकारी आंदोलनों के साथ पराधीन भारतवर्ष की राजनीतिक परिस्थिति का तुलनात्मक विचार सरदार के चिंतन का एक विशिष्ट पक्ष था। बलिष्ठ हाथों में पिस्तौल लेकर जिस प्रकार लक्ष्य- भेद करने में वह माहिर थे, उसी प्रकार उनकी सुंदर उंगलियां लेखनी चलाने में माहिर थीं।
     'प्रताप' में काम करते समय डैन ब्रीन लिखित 'माई फाइट फार आइरिश फ्रीडम' का बड़ा ही सुंदर अनुवाद उन्होंने किया था। दिल्ली के साप्ताहिक 'अर्जुन' के सम्पादकीय में भी वह लेखनी चलाते रहे। उन्हीं दिनों पंजाब के विद्रोही किसान आंदोलन, कूका विद्रोह और बब्बर अकाली आंदोलन पर लिखी उनकी पांडुलिपियां मैंने पढ़ी थीं। फांसी के पहले पंजाब के तत्कालीन गवर्नर के पास उन्होंने अपने साथ फांसी की सजा से दंडित अन्य साथियों को फांसी के फंदे से लटकाने के बजाय युध्दबंदियों की भांति गोली से उड़ा दिए जाने के लिए जो आवेदन पत्र भेजा था। उसकी शैली एवं दलील दोनों ही अपने ढंग की अकेली चीज थीं यानी सरदार न सिर्फ एक क्रांतिकारी भर ही थे बल्कि इसके साथ-साथ एक दूरदर्शी राजनेता, सफल अनुवादक, पत्रकार एवं चिंतक का अद्भुत सम्मिश्रण उनके व्यक्तित्व में मौजूद था।
      अपने ध्येय के लिए जीवन की आहुति चढ़ा देने की प्रबल प्रेरणा एवं आकांक्षा से ही सब दिन प्रेरित हुए और निश्चित मृत्यु की ओर बढ़ते गए। अनासक्त हृदय का कोई व्यक्ति ही इस प्रकार संसार की स्थूल वासनाओं से मुक्त होकर मृत्यु को सहर्ष गले लगा सकता है। स्वामी विवेकानंद की वाणी, सरदार के संदर्भ में, मुझे हमेशा याद आती रहती है-'यदि तुम्हारा मन अनासक्त है। तो तुम्हारी भक्ति भी अपरिसीम है। संसार की कोई भी ताकत तुम्हारी गति का प्रतिरोध नहीं कर सकती'। और इसमें संदेह नहीं कि अंग्रेज शासकों की विशाल राक्षसी शक्ति भी सरदार की जीवन गति का प्रतिरोध कर पाने में सब दिन असमर्थ रही। 7 अक्टूबर, 1930 को फांसी की सजा सुनाई गयी थी और 23 मार्च, 1931 की शाम उन्हें फांसी दे दी गयी। वह सब दिन कहा करते थे मातृभूमि की बलिवेदी पर कौन पहले जायेगा, कौन पीछे, नहीं मालूम लेकिन चाहे जो कोई पहले जाए उसके लिए हम आंसू नहीं बहायेंगे बल्कि उसके अधूरे कार्यों को पूरा करने की कोशिश करेंगे। हमारा बलिदान यों ही नहीं जायेगा बटुक! यह और बात है कि आने वाले परिणामों को देखने के लिए हम संसार में नहीं रहें...

सरदार सचमुच आजादी देखने के लिए नहीं रहे, लेकिन उनका बलिदान भी यों ही नहीं गया। आज सोचता हूं तो लगता है जैसे स्पष्ट दृष्टि में आने वाला समय बिल्कुल ही स्पष्ट और साफ होकर कैद था- शहादत के बाद चाहे जितना समय लगे, देश आजाद होगा और जरूर होगा।































- यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी – 8th समापन किश्त-यशपाल

" भगत सिंह विचार माला " by V.C.
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यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी – 8th समापन किश्त-यशपाल
( क्रांतिकारी और महान कथाकार स्व.यशपाल)








8 अप्रैल 1929 के असेम्बली बम कांड का समाचार जिसमें भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त का चित्र दिखाई दे रहा है



केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने का विचार किसी बहुत बड़ी झोंक या पिनक का परिणाम नहीं था। यह योजना एच.एस.आर.ए. की नीति और कार्यक्रम का मुंह बोलता उदाहरण था। अंग्रेज सरकार उस समय की केंद्रीय विधानसभा में दो नये दमनकारी कानून बनाने की चेष्टा कर रही थी। इनमें से एक था 'सार्वजनिक सुरक्षा कानून' और दूसरा मजदूरों की मांगें, और उनकी हड़तालों से संबंध रखने वाला 'औद्योगिक विवाद कानून' था। एच.एस.आर.ए. के साथी यह जानते थे कि विधान सभा में कांग्रेस और उदार दल के सदस्यों को मिला कर बहुमत इन कानूनों के विरुध्द में होगा। सरकार साधारण तरीके या बहुमत से इन कानूनों को पास नहीं करा सकेगी। यह भी मालूम था कि विधान सभा द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने पर भी सरकार इन कानूनों को वाइसराय की विशेष स्वीकृति से कानून बना देगी। यह दोनों कानून जनता में बढ़ते जाते असंतोष की भावना को कुचलने के प्रयोजन से बनाये जा रहे थे।
      एच.एस.आर.ए. की केंद्रीय समिति ने निश्चय किया था कि जिस समय इन कानूनों के बहुमत द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने पर भी इन्हें वाइसराय की आज्ञा से कानून बना दिए जाने की घोषणा विधानसभा में की जाए, एच.एस.आर.ए. की ओर से बम फेंक कर सरकार के दमनकारी व्यवहार के प्रति विरोध प्रकट किया जाये। बम फेंक कर विरोध प्रदर्शित करने के दो पहलू थे- एक पहलू में विदेशी सरकार को यह चुनौती थी कि तुम प्रजा के प्रतिनिधियों के निण्र्[1]ाय के विरुध्द शस्त्रा-शक्ति से शासन कर रहे हो तो उस का उत्तार हम भी शस्त्रा-शक्ति से देने के लिए तैयार हैं। दूसरे पहलू में वैधानिक आंदोलन द्वारा विदेशी सरकार का विरोध करने वाले राष्ट्रीय प्रतिनिधियों को चेतावनी थी कि आपका वैधानिक विरोध निष्फल है। आप के वैधानिक विरोध के बावजूद दमनकारी कानून बनाये जा सकते हैं। इस विधानसभा के पाखंड से क्या लाभ? विदेशी सरकार के दमनकारी शासन पर से वैधानिकता का नकाब हटा देना आवश्यक है। विदेशी सरकार के विरोध का वास्तविक मार्ग उससे युध्द करना है।
      इस काम की योजना को सफल बनाने के लिए एच.एस.आर.ए. का केंद्र भी अब दिल्ली में ही कायम किया गया और साथी जयदेव कपूर को विधान सभा की परिस्थितियों की जांच-पड़ताल करने के लिए नियुक्त कर दिया गया। तब भी विधानसभा में प्रवेश पासों द्वारा ही होता था। ऐसा प्रबंध कर लेना आवश्यक था कि जब चाहें दो-तीन पास सुविधा से मिल सकें। जयदेव ने विधानसभा की चौंकसी करने और पास देने वाले दफ्तर में अपना परिचय दिल्ली 'हिंदू-कालिज' में अर्थशास्त्र पढ़ने वाले विद्यार्थी के रूप में दिया था ताकि वह सुविधा से असेंबली के पुस्तकालय में आ-जा सके। दफ्तर के आदमियों पर विश्वास जमा लेने के बाद वह विधानसभा के अधिवेशन के समय दर्शकों की गैलरी में बैठ कर सभा की कार्यवाही भी देखता रहता। चौकसी दफ्तर के अधिकारी से काफी परिचय हो जाने पर जब चाहे दो या तीन पास बनवा लेने में भी जयदेव को कुछ कठिनाई न होती थी। साधारणत: पासों की आवश्यकता होने पर कांग्रेसी सदस्यों से चिट्ठी लेकर पास ले लिए जाते थे। जब-तब दूसरे साथी भी विधानसभा में आते-जाते रहते थे ताकि स्थान की परख अच्छी तरह से हो जाय।
      भगत सिंह भी जयदेव के साथ एक-दो बार विधानसभा में हो आया था। ऐसे हीएक मौके पर गैलरी में भगत सिंह की डाक्टर किचलू से आंखें चार हो गयी थीं। उस की दाढ़ी-मूंछ सफाचट देख कर डाक्टर साहब कुछ विस्मित से रह गए। सांडर्स कांड अभी ताजा ही था। पहले तो भगत सिंह ने अपना चेहरा अखबार की आड़ में छिपाने की कोशिश की परंतु जब डाक्टर साहब ने पहिचान ही लिया तो बाहर आने पर भगत सिंह ने उनसे नि:शंक मुलाकात की। डाक्टर किचलू ने बड़े सौहार्द्र से यथासंभव सहायता देने का विश्वास दिलाया। देहली में जब-जब भगत सिंह उनसे मिलता, वे सहायता देते भी रहते।
      विधान सभा में बम फेंकने की योजना के संबंध में ब्योरे की 
कई बातों पर विचार होता रहा। पहला प्रश्न था कि बम फेंकने वाले साथियों को घटना के पश्चात् सभा भवन से बचा कर निकाल लाने का प्रयत्न किया जाए या नहीं। आजाद भी एक दिन विधान सभा की गैलरी में कार्यवाही देखने गए और स्थिति का निरीक्षण कर इस परिणाम पर पहुंचे कि बम फेंकने वाले साथियों को सुरक्षित निकाल लाना कठिन नहीं अलबत्ता वहां से उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के लिए एक मोटर गाड़ी की जरूरत होगी।
      समय पर एक मोटर मिल सकने का भी प्रबंध कर लिया 
गया। यह भी निश्चय हो गया कि कौन-कौन साथी इस काम में भाग लेंगे परंतु भगत सिंह और विजय कुमार सिन्हा ने आगह किया कि विधान सभा में बम फेंक कर केवल परचे बांट देने से ही हम जनता के सम्मुख अपने उद्देश्य को पर्याप्त रूप से प्रकट नहीं कर सकेंगे। जनता एच.एस. आर.ए. को कुछ बिगड़े दिमाग खूनी नौजवानों की टोली समझ बैठेगी। आवश्यक यह है कि बम फेंकने वाले साथी बचने की कोशिश न करें। बम फेंकने के साथ वे साम्राज्यवाद विरोधी प्रदर्शन भी करें और बाद में मुकद्दमा चलने पर अदालत में अपनी नीति का स्पष्टीकरण करें। इस प्रकार हमारा कार्यक्रम और उद्देश्य जनता के सामने आ सकेंगे। साथियों ने इस मुकद्दमे की कल्पना एच.एस.आर.ए. के सैध्दांतिक मोर्चें के रूप में की थी।
      साधारणत: हम जो बातें कहना या जनता को सुनाना चाहते थे, वे राजद्रोही समझी जाती थीं। उन्हें कोई पत्र प्रकाशित करने का साहस नहीं कर सकता था, न सभा के मंच से ही वे बातें कही जा सकती थीं परंतु यह बातें अभियुक्तों के बयान के रूप में या अभियुक्तों पर लगाये गए अपराध के वर्णन के रूप में प्रकाशित हो सकती थीं। असेंबली-बमकांड और लाहौर-षडयंत्रा के मुकद्दमों से यह उद्देश्य एक सीमा तक पूरा होता रहा। बाद में सरकार भांप गयी कि क्रांतिकारी राजद्रोह के प्रचार के लिए उसकी अदालतों का ही उपयोग कर रहे हैं और एच.एस.आर.ए. के अभियुक्तों के बयानों का पत्रों में प्रकाशन भी गैरकानूनी करार दे दिया गया।
      यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि उस समय 
एच.एस.आर.ए. ने विधान सभा में बम फेंक लेना ही अपना लक्ष्य नहीं समझा बल्कि बम फेंकने को अपनी बात कह सकने का अवसर बनाने का उपाय समझा था। यदि बम फेंकना ही लक्ष्य होता तो बम फेंकने के बाद अपने आदमियों को निकाल सकने का अवसर होते हुए भी उन्हें कुर्बान कर देने का कोई अर्थ न होता। बम फेंकने मात्र के लिए दल का कोई भी साहसी व्यक्ति पर्याप्त हो सकता था। इस काम के लिए दल के विशेष योग्य व्यक्तियों को कुर्बान करने का प्रयोजन केवल यही था कि बम फेंक कर पैदा किये गए वातावरण में अपना उद्देश्य और नीति जनता के सामने रखी जाये। एच.एस.आर.ए. के इस व्यवहार से स्पष्ट हो जाता है कि इस समय सशस्त्रा क्रांति की चेष्टा करने वाले लोग आतंक की अपेक्षा जनमत और जनशक्ति के संगठन को अधिक महत्व दे रहे थे।
      विधान सभा में बम फेंकने को अपना सैध्दांतिक मोर्चा बनाने 
का निश्चय कर लेने पर यह समस्या सामने आई कि इस काम के लिए ऐसे कौन साथी नियुक्त किये जाएं जो एच.एस.आर.ए. के उद्देश्य को जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखने के योग्य हो। इसके लिए कई बार कई नामों पर विचार किया गया।
      भगत सिंह के साथ कभी जयदेव कपूर का नाम रक्खा जाता, कभी राजगुरु का। विजय कुमार और शिव वर्मा भगत सिंह को असेंबली में भेजने का विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि आज़ाद और भगत सिंह में से किसी को भी इस काम के लिए नहीं जाना चाहिये क्योंकि संगठन के भविष्य के लिए इन दोनों की आवश्यकता अनिवार्य है।
      एच.एस.आर.ए. की केंद्रीय समिति की जिस बैठक में विधानसभा में बम फेंकने के लिए भगत सिंह को न भेज कर दूसरे दो साथियों को भेजने का निश्चय किया गया था, उस बैठक में सुखदेव न पहुंच सका था। इस निश्चय की सूचना सुखदेव को भी तुरंत भेज दी गयी थी। सूचना मिलते ही सुखदेव सीधा दिल्ली पहुंचा। अगली बात कहने से पहले यह कह दूं कि भगत सिंह और सुखदेव में बहुत ही गहरी घनिष्ठता थी। वे एक दूसरे के लिए जान दे सकते थे। सुखदेव ने भगत सिंह को एकांत में ले जाकर बात की-
      ''विधान सभा में बम फेंकने के लिए तो तुम्हें जाना था, दूसरे आदमियों को भेजने का निश्चय कैसे हो गया?''
      सम्भवत: भगत सिंह ने उत्तार दिया कि समिति का निर्णय है 
कि संगठन के भविष्य के लिए उसे पीछे रखने की जरूरत है।
      सुखदेव ने अपने रूखे और कड़े ढंग से विरोध किया-''यह सब बकवास है! तुम्हारे व्यक्तिगत मित्रा की स्थिति से मैं देख रहा हूं कि तुम अपने पांव कुल्हाड़ी मार रहे हो। यह देख कर मैं चुप नहीं रह सकता। जानते हो, तुम किस रास्ते पर चल रहे हो। तुम्हारा अंहकार बहुत बढ़ गया है। तुम अपने आपको दल का एक मात्र सहारा समझने लगे हो। तुम सान्याल दादा और जयचंद्र बनते जा रहे हो। जानते हो, तुम्हारा क्या अंत होगा? तुम एक रोज भाई परमानंद बन जाओगे।
      सुखदेव ने 1914-15 के लाहौर षडयंत्र के मुकदमे में दिया गया हाईकोर्ट के जज का निर्णय बताया। जज ने भाई परमानंद जी के लिए कहा था- 'भाई परमानंद इस क्रांतिकारी संगठन का मस्तिष्क और सूत्राधार है। परंतु व्यक्तिगत रूप से यह आदमी कायर है। यह संकट के काम में दूसरों को आगे झोंक कर अपने प्राण बचाने की चेष्टा करता रहा है।''
      सुखदेव ने कहा-''तुम सदा तो यों बच नहीं सकते। एक दिन तुम्हें भी अदालत के सामने आना ही पड़ेगा। उस दिन तुम्हारे लिए भी वैसा ही फैसला लिखा जाएगा जो भाई परमानंद के लिए लिखा गया था।''
      भगत सिंह के स्वभाव में ओज या उत्तेजना की कमी नहीं थी। वह चुपचाप सुखदेव की ओर देखता रहा। सुखदेव ने यहीं बस नहीं की। वह और आगे बढ़ा-''तुम कहना चाहते हो कि तुम संगठन के हित के लिए शहीद बनने के सम्मान को बलिदान कर रहे हो। ईमानदारी से अपने गिरेवान में झांक कर देखो! तुम इस समय मौत का सामना नहीं करना चाहते; क्योंकि तुम्हें जिंदगी इस समय बहुत लुभावनी लग रही है। तुम 'उस' औरत के स्नेह की आंच सेंकना चाहते हो और इसे दल के प्रति उत्तारदायित्व का बहाना बना रहे हो। तुम दूसरों से जो चाहे कहो, लेकिन मैं तुम से और तुम मुझ से नहीं छिप सकते। तुम फिसल रहे हो।''
      भगत सिंह बहुत देर तक कुछ बोल न सका। केवल सुखदेव की ओर घूरता रह गया जैसे पिंजरे में बंद शेर चोट करने वाले की ओर देखता रह जाए; फिर बोला-''विधानसभा में बम फेंकने मैं ही जाऊंगा। केंद्रीय समिति को मेरी बात माननी पड़ेगी। तुमने मेरा जो अपमान किया है उसका मैं उत्तर नहीं दूंगा। इसके बाद अब तुम मुझसे कभी बात न करना।''
      सुखदेव ने रूखे ही स्वर में उत्तर दिया-''प् ींअम कवदम उल कनजल जवूंतके उल तिपमदकष्ण् (मैंने अपने मित्र के प्रति अपना कर्त्तव्य ही पूरा किया है।) इस बातचीत के बाद दोनों अलग-अलग दल के केंद्रीय स्थान पर पहुंचे।
      सुखदेव जब दिल्ली से लाहौर पहुंचा उस समय भी उसकी 
आंखें सूजी हुई थीं। जान पड़ता था कि बहुत रोया है। वह किसी से बात न कर पाता था।
      1929 के अप्रैल की सात तारीख, दोपहर बाद सुखदेव ने भगतवती भाई को ढूंढ कर कहा-''भगत सिंह से अंतिम बार मिल लेना चाहते हो तो आज रात की गाड़ी से दिल्ली चलो!...भाभी को भी साथ ले लो।''
      सुशीलाजी उस समय छुट्टी लेकर लाहौर में भगवती भाई के यहां ही ठहरी हुई थीं।वे भी साथ गयीं। शची लाहौर से कलकत्तो तक और लौटते समय दिल्ली की यात्रा में 'लंबे चाचा जी' (भगत सिंह) से बहुत हिल गया था; इसलिए उसे भी साथ ले लिया गया। 8 अप्रैल प्रात: दिल्ली स्टेशन पर पहुंच कर सुखदेव ने भगवती भाई, दुर्गा भाभी और सुशीला जी को 'कुदसियाबाग' में जाकर प्रतीक्षा करने के लिए कहा और स्वयं दूसरी ओर चला गया।
      इन लोगों के कुछ समय प्रतीक्षा करने के बाद सुखदेव भगत सिंह के साथ वहां आया। क्या होने जा रहा है, इस विषय में कोई चर्चा नहीं हुई। भगत सिंह को रसगुल्ले और संतरे बहुत पसंद थे। भाभी और सुशीलाजी ये चीजें काफी मात्रा में साथ लेती आर्इं थीं। भगत सिंह को दोनों ने लाड़ से खूब खिलाया। साढे दस बजे के लगभग भगत सिंह विदा लेकर चला गया। भाभी और सुशीलाजी इतना तो जानती थीं कि भगत सिंह को अंतिम विदाई दे रही हैं। परंतु उन्हें यह मालूम न था कि क्या होने जा रहा है। यह दल का अनुशासन था। दोनों ने भगत सिंह को रोली और अक्षत से टीके लगा दिये।
      8 अप्रैल, 1929 के दिन विधान सभा में हिंदुस्तानी जनमत के विरोध के बावजूद 'सार्वजनिक सुरक्षा' और 'औद्योगिक विवाद' बिलों को वाइसराय की विशेष स्वीकृति से कानून बना देने की घोषणा की जाने वाली थी। विधान सभा की कार्यवाई आरंभ होने पर पहले प्रश्न और उत्तार होते हैं तब भी यही क्रम था। भगत सिंह और दत्ता जयदेव कपूर के साथ असेंबली में ऐसी जगह जाकर बैठ गए जहां से नीचे फर्श पर सरकार के सदस्यों की जगह बिलकुल सामने पड़ती थी।
      इस बात पर भी काफी विचार किया जा चुका था कि बम नीचे
 बैठी हुई विधान सभा के किस भाग में फेंके जायेंगे। अंग्रेज सरकार के गृह-सदस्य और उस समय के सरकारी दल के नेता सर जान शुस्टर और  विरोधी दल के नेता पंडित मोतीलाल नेहरू और इन के साथी आमने-सामने बहुत समीप ही बैठते थे। बम ठीक जान शुस्टर पर फेंकने से सरकारी सदस्यों के साथ ही कांग्रेस के सदस्यों के भी काफी चोट खा जाने और विधान सभा के प्रधान की कुर्सी पर बैठे विठ्ठलभाई पटेल के भी बहुत चोट खा जाने की आशंका थी इसलिए यह निश्चय किया गया था कि बम सर जान शुस्टर के कोच की काठ की दीवार के पीछे फेंका जाए ताकि उसकी चोट कांग्रेसी सदस्यों की बेंचों की ओर न जा सके।
      बम ऐसी जगह फेंकने से उसकी अधिकांश शक्ति जरूर ही 
काठ के भारी फर्नीचर से दब गयी और सरकारी सदस्यों को भी कम चोट आने की सम्भावना रही परंतु इससे कांग्रेस प्रतिनिधियों के लिए आशंका का कोई अवसर नहीं रहा। यह भी सोचा गया था कि कांग्रेस-सदस्यों को उस दिन विधान सभा में न जाने की चेतावनी दे दी जाए परंतुऐसा करने पर संदेह हो जाने से बात समय से पूर्व फूट जाने की आशंका थी इसलिए ऐसा नहीं किया गया।
      ज्यों ही सर जान शुस्टर उपरोक्त बिलों पर वाइसराय की विशेष स्वीकृति की घोषणा करने के लिए खड़े हुए, विधान सभा में उपस्थित एच.एस.आर.ए. के दूसरे साथी सभा भवन से बाहर निकल गए। भगत सिंह और दत्त के सभा भवन में जाने के 'पास' इन लोगों ने पहले ही उनसे ले लिए थे। यह सावधानी आवश्यक थी क्योंकि भगत सिंह और दत्ता के गिरफ्तार हो जाने के बाद उनकी तलाशी ली जाने पर उनकी जेब में मिले पासाें से यह न मालूम हो जाए कि उन्होंने किस सदस्य की मार्फत ये पास लिए थे। उस सदस्य से अभियुक्तों का संबंध मान लिया जाता और पुलिस उसे परेशान करती।
      ज्यों ही शुस्टर ने यह घोषणा की कि 'सार्वजनिक सुरक्षा' और 'औद्योगिक विवाद' बिल विधान सभा में बहुमत से अस्वीकार कर दिए जाने पर भी वाइसराय की विशेष स्वीकृति से कानून बना दिए गए हैं, भगत सिंह और दत्ता अपनी जगह पर उठ खड़े हुए। पहले से निश्चित स्थान पर भगत सिंह ने एक बम शुस्टर के काउच की दीवार के पीछे फेंक दिया। विस्फोट के भयंकर शब्द से सभा भवन में बैठे लोग बहरे से हो कर      स्तब्ध रह गए। इस के बाद दूसरा बम दत्त ने लगभग उसी स्थान पर फेंका। सभा भवन में भगदड़ मच गयी। हाल नीले धुंये से भर गया। सब सदस्य और दर्शक आतंक में भागने लगे। भवन में उस समय केवल तीन या चार व्यक्तियों के होश-हवास दुरूस्त जान पड़े। बिठ्ठल भाई पटेल, पंडित मोतीलाल नेहरू और जिन्ना अपनी कुर्सियों पर जैसे बैठे थे बैठे रहे। सर जान शुस्टर घोषणा करते समय खड़ा था वह वैसे ही खड़ा रह गया। भगत सिंह ने सर जान शुस्टर पर दो गोलियां चलायीं। यह गोलियां शुस्टर के शरीर पर न लग कर उस के डेस्क पर लगीं। शुस्टर अपने पर वार होता समझ कर आत्मरक्षा के लिए अपनी डेस्क के नीचे हो गया। शुस्टर के दुबक जाने के बाद भगत सिंह के पिस्तौल में छह गोलियां और जेब में आठ गोलियां शेष थीं परंतु उसने किसी दूसरे व्यक्ति पर गोली नहीं चलायी।
      भगत सिंह और दत्त ने बहुत ऊंचे स्वर में नारे लगाये- 
इंकलाब जिंदाबाद! साम्राज्यवाद का नाश हो! दुनिया के मजदूरो एक हो! -नारे लगाते हुए उन दोनों के एच.एस.आर.ए. के लाल रंग के घोषणापत्र हाल में फेंक दिए ।
      बम के धड़ाके से विधान सभा के सभी लोग और चौकसी के 
लिए तैनात सभा भवन की पुलिस भी इतना घबरा गयी थी कि दर्शकों की गैलरी पूरी खाली हो जाने के बाद भी कुछ देर तक किसी ने भी भगत सिंह और दत्ता के समीप आने का साहस नहीं किया। भगत सिंह और दत्ता अव्बल तो दर्शकों की भीड़ के साथ ही बाहर निकल जा सकते थे और उस के बाद भी निकल जाने का काफी समय था। पिस्तौल और बारह कारतूस तब भी इन लोगों के पास मौजूद थे। इन पर चलाये गए मुकद्दमे में पुलिस केगवाहों के बयान के आधार पर जज ने अपने फैसले में भी यह कहा था कि यदि अभियुक्त चाहते तो उन के बच कर भाग आने के लिए काफी अवसर था।
      यह भी तो निश्चित था कि उन्हें भागकर बचना नहीं था बल्कि अपनी बात कह सकने का अवसर बनाना था। यह बात भी अप्रासंगिक नहीं होगी कि 'साम्राज्यवाद का नाश हो' (क्वूद ूपजी प्उचतपंसपेउ) का नारा लगाया और संसार के मजदूरों के एके की पुकार की। यह दोनों नारे एच.एस.आर.ए. के तत्कालीन राजनैतिक दृष्टिकाण को स्पष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
      भगत सिंह और दत्त के काफी देर तक गैलरी में निश्चल खडे रहने पर सार्जेंट टेरी ने आकर उन से प्रश्न किया ''क्या यह तुम्हीं ने किया था?''  
      भगत सिंह ने हामी भरी। गोली भरा पिस्तौल अब भी उस के 
हाथ में था। वह चाहता तो उस गोरे सार्जेन्ट को वहीं ठंडा कर देता परंतु एच.एस.आर.ए. की युध्द घोषणा अंग्रेज व्यक्तियों के विरुध्द नहीं बल्कि अंग्रेज साम्राज्यशाही व्यवस्था के विरुध्द थी। भगत सिंह उस समय के लिए निश्चित अपना काम कर चुका था। अलबत्ता सर जान शुस्टर पर गोली चलाने का कारण यह था कि वह विधान सभा में ब्रिटिश शासन व्यवस्था  के मुख्य प्रतिनिधि के रूप में था। उस समय भगत सिंह और दत्ता खाकी निकर और कमीज पहने हुए  थे। दोनों के शरीर पर ऊनी कोट भी थे। भगत सिंह हाथ में फेल्ट हैट भी लिए था।
      भगत सिंह और दत्त के आत्मसमर्पण कर देने पर सशस्त्र पुलिस ने उन्हें बड़े साज-बाज से गिरफ्तार कर लिया और खूब चौकसी से घेर उन्हें अलग-अलग मोटरों में बैठा कर 'नई दिल्ली' के थाने की ओर ले गयी।
      भगत सिंह और दत्त को लिए मोटरें सड़क पर एक टांगे के पास से गुजरीं। इस टांगे में भगवतीचरण, भाभी और सुशीला जी मौजूद थे। सुखेदव टांगे का सहारा लिए साइकिल पर साथ-साथ चल रहा था। टांगे के पास से पुलिस से भरी मोटरें गुजरने पर इन लोगों ने एक दूसरे को पहचाना परंतु व्यवहार न पहचानने का ही किया। यह मन का कितना बड़ा संयम था। भगत सिंह को उस समय मृत्यु के हाथों से लौटा लेने के लिए अपने प्राण दे देना इनके लिए अधिक आसान होता। संयम और अनुशासन का ऐसा उदाहरण विकृत मस्तिक या कायर के लिए संभव नहीं हो सकता। वयस्क और समझदार लोग तो वैसे ही चुप जैसे 'पन्ना दाई ' कर्तव्य रक्षा में अपनी संतान को टुकड़े-टुकड़े होते देख कर चुप रह गई थी परंतु भाभी की गोद में बैठा शची भगत सिंह को समीप से गुजरती मोटर की तरफ बांह उठा कर जोर से चिल्ला उठा-''लंबे चाचा जी!''
      भाभी ने तुरंत शची का मुंह गोद में दबा कर चुप करा दिया। यह क्या पीड़ा से उठती रूलाई निकलने न देने के लिए अपना गला घोंट लेने से कम था ?   विधान सभा में बम विस्फोट की घटना के समाचार ने देश भर को हिला दिया। अंग्रेजी सरकार की पुलिस घबरा गयी थी। दिल्ली से तुरंत कलकत्ते की 'विशेष क्रांतिकारी पुलिस' (ैचमबपंस ज्मततवतपेज च्वसपबम) को पुकारा गया। दिल्ली से सभी दूसरे प्रांतों की राजधानियों तक टेलीफोन और दूसरे तार सरकारी संदेशों के लिए रिजर्व कर लिए गए। उन दिनों दिल्ली में 'स्टेट्समैन' के संवाददाता लाला दुर्गादास थे। उन्होंने उसी समय विधान सभा बमकांड का समाचार टेलीफोन या तार द्वारा कलकत्ते भेजना चाहा परंतु समाचार भेजने के सभी साधन सरकारी काम के लिए रिजर्व थे। लाला दुर्गादास ने इस समय पत्राकार की विशेष सूझ दिखाई। उन्होंने यह समाचार 'स्टेटसमैन' के लन्दन दफ्तर को भेज दिया और लन्दन से यह समाचार वायरलेस से कलकत्ते भेज दिया गया। जिस समय 'एसोशियेटेड प्रेस आफ इंडिया' द्वारा इस घटना का समाचार कलकत्ते के दूसरे पत्रों को मिला, 'स्टेटसमैन' का बम घटना का समाचार लिए 'विशेषांक' बाजार में भी पहुंच चुका था।
      पुलिस ने इस कांड के पीछे षडयंत्र का पता लगाने की सिर 
तोड़ कोशिशें कीं परंतु कहीं कोई सूत्रा न मिल सका। इस समय तक सांडर्स कांड का भी कोई सूराग न मिल सका। लाहौर-षड़यंत्र और सांडर्सवध से इस घटना के संबंध का पता लाहौर बम फैक्टरी में गिरफ्तार किये गए मुखबिर जयगोपाल के बयान से ही मिला था।
      अदालत के मंच से अपनी बात कह सकने के लिए एच.एस.आर.ए. ने भगत सिंह और दत्ता को विधानसभा भवन में बलिदान किया था। अदालत में अपने-अपने सिध्दांत की बात किस प्रकार कह सकते थे! उन पर असेंबली में बम फेंक कर पर हत्या करने की चेष्टा का अभियोग लगाया गया था। और सेशन जज ने भारत दंड विधान की धारा 307 और विस्फोटक पदार्थ रखने के अपराध में उन्हें उम्र कैद का दंड दिया था।