गुरुवार, 31 मार्च 2016

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी-7-यशपाल

" भगत सिंह विचार माला " by V.C.
 (9) 

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी-7-यशपाल
( क्रांतिकारी और महान कथाकार स्व.यशपाल)


आजाद को अच्छी-अच्छी पुस्तकें लाकर साथियों को पढ़ाने का बहुत शौक था परंतु उपन्यास या यौन विषय (सेक्स) संबंधी पुस्तकें देखकर उन्हें बहुत ही चिढ़ उठती थी। ब्रह्मचर्य का एक बहुत रूढ़िवादी आदर्श उस समय तक आजाद के मस्तिष्क में था। उससे पहले दो-एक दफे दल में ऐसे कांड हो चुके थे कि साथियों ने नारी के आकर्षण के कारण अपने कर्तव्य में निर्बलता दिखाई थी। आजाद को नारी, प्रेम और सौंदर्य की चर्चा से ही चिढ़ हो गई थी। कसरत स्वयं करने और दूसरों को कराने का भी शौक था। यदि कोई और काम न हो तो आजाद का मन लगातार बातचीत करने से या हवाई पिस्तौल ले कर किसी बारीक चीज पर निशाने का अभ्यास करते रहने से बहलता था।
      उस समय आजाद और दूसरे साथियों की ब्रह्मचर्य, नारी और सौन्दर्य के बारे में कैसी धारणायें थीं, यह दो-एक बहुत छोटे-छोटे उदाहरणों से स्पष्ट हो जायेगा। प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप में स्त्री का प्रसंग चलते ही आजाद एतराज किये बिना न रह सकते थे- ''फिर 'चुम्बक' की बात। यह साला 'चुम्बक' जिसे लगा ले डूबा। सिपाही को औरत से क्या मतलब '' उस समय ऐसी धारणा केवल आजाद की थी। दूसरे साथियों को स्त्री और प्रेम की चर्चा से कोई परहेज नहीं था। हां, सुखदेव भी इस प्रसंग में कम ही रस लेता था परंतु आदर्श की दृष्टि से कोई विरोध न था। उसका कहना था-'जब औरत है नहीं तो उस की चर्चा से क्या फायदा।'
      आजाद का सब से प्रिय गाना था-'मां हमें विदा दो, जाते हैं हम विजयकेतु फहराने आज।' वे प्राय: ही भगत सिंह या राजगुरु और बाद में बच्चन (वैशम्पायन) से यह गाना सुनाने के लिए अनुरोध करते। राजगुरु यों तो धीर स्वभाव था परंतु चुटकियां लेने में उसे मजा आता। जब आजाद उसे गाने के लिए कहें तो वह जरूर ही कोई इश्किया गजल गुनगुनाने की चेष्टा करने लगता। यह गजलें वह प्राय: भगत सिंह से सुन कर याद कर लेता था। भगत सिंह को शायरी से भी बहुत शौक था। महाराष्ट्रीय होने के कारण राजगुरु का उर्दू उच्चारण बहुत विचित्र था। गजल में वह आशिक और 'माशूक' को प्राय: ही 'आशुक' और 'माशिक' कह जाता और खूब हंसता। यदि आजाद 'विजयकेतु' वाला गाना सुनने पर जिद्द ही करें तो वह हंस कर उत्तर देता-'अभी पुलिस आता है विजयकेतु लेकर।'
      एक रोज राजगुरु कहीं से बहुत सुंदर स्त्री की तस्वीर का एक कैलेण्डर ले आया और लाकर 'नाई की मंडी' आगरा वाले मकान में दीवार पर लटका दिया। आजाद कहीं बाहर से लौटे। बच्चन (वैशम्पायन) ने उस कैलेंडर की और  संकेत किया-''भैया, देखा! यह कौन ले आया है?''
      आजाद ने कैलेंडर की ओर देखा। माथे पर बल पड़ गए। 
कैलेंडर को कील समेत दीवार से खींच लिया और फाड़ कर फेंक दिया।
      कुछ देर बाद राजगुरु लौटा। दीवार से अपना कैलेंडर गायब देखकर वह ऊंचे स्वर में पुकार उठा-''अरे, हमारे कैलेंडर का क्या हुआ?''
      बच्चन ने ओंठ दबाकर फर्श पर पड़े कैलेंडर के टुकड़ों की ओर देखा। राजगुरु ने झुंझलाहट और क्रोध के स्वर में प्रश्न किया-''यह किस ने किया?''   ''हमने किया।'' आजाद भला किसी से डरते थे।
      आजाद के प्रति आदर से स्वर को कुछ धीमा कर राजगुरु ने विरोध किया-''आपने क्यों फाड़ डाला? हम इतने शौक से तस्वीर लाये थे।''
      ''हमें-तुम्हें ऐसी तस्वीरों से क्या मतलब?'' आजाद ने डपट दिया।
      ''वाह, इतनी खूबसूरत तस्वीर थी।''

      ''हमें-तुम्हें खूबसूरत से मतलब?'' नाराजगी से ऊंचे स्वर में 
आजाद ने डांटा।
      ''तो जो कुछ खूबसूरत होगा उसे फाड़ डालोगे, तोड़ डालोगे?'' 
राजगुरु भी अड़ गया।
      ''हां तोड़ डालेंगे?'' आजाद ने सीना तान लिया।

      ''तो जाकर ताजमहल को भी तोड़ डालो'' राजगुरु ने चुनौती दी।
      ''हां तोड़ डालेंगे, जब हमारा बस चलेगा।'' आजाद की आंखों में सुर्ख डोरे उभर आए।
      दूसरे साथियों को होंठ दबाये, आंखें चुराते देख कर राजगुरु की झल्लाहट भी मुस्कराहट में बदल गई।
      ब्रह्मचर्य के विषय में 1929 के आरंभ में आजाद की ऐसी ही धारणा थी परंतु एक ही वर्ष में उन का दृष्टिकोण बहुत ही स्वाभाविक और यथार्थवादी हो गया था। अनाचार और उच्छृंखलता से तो आजाद को सदा ही घृणा रही परंतु 1930 के जाड़ों की बात मुझे याद है कि कानपुर के 'चुन्नीगंज' मुहल्ले में आजाद मुझ से बात किया करते थे कि क्रांति को जीवन भर का काम बना लेने वाले आदमी को क्रांतिकारी स्त्री से विवाह कर लेना चाहिए। कभी मजे में आकर सम्भावित पत्नी का जिक्र करते हुए कल्पना किया करते थे:

      ''...पहाड़-पहाड़ घूम रहे हों, एक राइफल उसके कंधे पर हो 
और एक हमारे     कंधे पर। दुश्मन से घिर जायें। वह राइफलें भरती जाए और हम दनादन-दनादन गोली चलाते जायें।''(क्रमशः)

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -6-यशपाल

" भगत सिंह विचार माला " by V.C.
 (8) 


यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -6-यशपाल
( क्रांतिकारी और महान कथाकार स्व.यशपाल)


लाहौर से फरार हो जाने पर भगतसिंह ने दिल्ली, आगरा, कानपुर, पटना और कलकत्ते तक बार-बार चक्कर लगाकर भिन्न-भिन्न प्रांतों के क्रांतिकारियों को एक सूत्र में बांधने की चेष्टा की। स्थिति सभी प्रांतों में खराब ही थी। स्थिति खराब होने का मुख्य कारण था, साधनों और संगठन की कमी। गुप्त क्रांतिकारी आंदोलन की सब से बड़ी कठिनाई यह थी कि उसका उद्देश्य तो सार्वजनिक था परंतु उसे जनता से दूर रह कर जनता की सहायता के बिना चलना पड़ रहा था। अपने दल के लोगों अथवा सहानुभूति रखने वाले उंगलियों पर गिने जा सकने योग्य व्यक्तियों को छोड़ कर क्रांतिकारी अपनी आवश्यकता और स्थिति का भेद किसी को नहीं दे सकते थे। काकोरी की डकैती असफल हो जानेऔर इस मामले में बहुत से लोगों के मुखबिर भी हो जाने के कारण इस समय क्रांतिकारी सर्वसाधारण लोगों से सहानुभूति की आशा कम ही रख सकते थे।

      युक्त प्रांत में उन दिनों बहतु निरुत्साह था। सशस्त्र क्रांति के बढ़ने की कोई आशा थी तो केवल काकोरी के बंदियों को छुड़ा सकने से। इसके लिए अनेक योजनाएं बार-बार बनतीं और प्रयोग में आए बिना ही रह जातीं। इस अवस्था से ऊबकर काकोरी दल के नेता शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ने जेल से संदेश भेजा था।बिस्मिल की बड़ी इच्छा थी कि एक बार किसी तरह जेल से निकल कर विदेशी सरकार से दो-दो हाथ कर पाते परंतु दल में इतनी शक्ति नहीं थीं; ये योजनाएं कपोल कल्पनाएं ही रह गई।भगत सिंह, सुखदेव, विजय और शिव वर्मा के प्रयत्नों से उत्तर भारत के प्रांतों के क्रांतिकारी प्रतिनिधियों की एक बैठक की योजना दिल्ली में की गई थी। यह बैठक 9-10 सिंतबर, 1928 को फीरोजशाह कोटला के खंडहरों में हुई थी। इस बैठक में पंजाब से  सुखदेव और भगत सिंह, राजपूताना से कुंदनलाल, युक्तप्रांत से शिव वर्मा, ब्रह्मदत्ता मिश्र, जयदेव, विजय कुमार सिन्हा, सुरेंद्रनाथ पांडे और बिहार से फणींद्रनाथ घोष और मनमोहन बनर्जी आए थे। आजाद इस बैठक में नहीं आ पाए थे। भगत सिंह और शिव वर्मा उनसे मिल चुके थे। आजाद ने आश्वासन दे दिया था कि बहुमत से जो कुछ निश्चय होगा, उसे वे स्वीकार कर लेंगे।
      अब तक भिन्न-भिन्न प्रांतों में क्रांतिकारी दलों के अपने-अपने पृथक नाम थे। बंगाल-बिहार के 'अनुशीलन' और 'युगांतर' समितियां, युक्त प्रांत में 'हिंदुस्तान प्रजातंत्र सेना' और 'बनारस रिवोल्यूशनरी पार्टी'। दिल्ली की बैठक में भगत सिंह और सुखदेव ने सभी प्रांतों से प्रतिनिधि लेकर एक केंद्रीय-समिति बनाई जाने और पूरे संगठन का नाम 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (हिंदुस्तानी समाजवादी प्रजातंत्रा सेना) रखे जाने का प्रस्ताव रखा।
      सोशलिस्ट शब्द जोड़े जाने का सुझाव भगत सिंह और सुखदेव ने ही दिया था परंतु युक्तप्रांत के शिव वर्मा और विजयकुमार सिन्हा का भी सबल अनुमोदन इनके साथ था। यह लोग कानपुर के संगठित मजदूर आंदोलन द्वारा प्रभावित हो चुके थे और कानपुर की मजदूर सभा से भी अपना संपर्क बना चुके थे। उन लोगों पर सन् 1925 के 'कानपुर बोल्शेविक षडयंत्र' का भी प्रभाव जरूर पड़ा होगा। सबसे बड़ी बात तो थी सन् 1928 में जगह-जगह हड़तालों द्वारा मजदूरों की चेतना और शक्ति का प्रदर्शन। एच.एस.आर.ए. के साथी मजदूर श्रेणी की क्रांतिकारी शक्ति से परिचित होने लगे थे।
      क्रांतिकारियों की बहुत सी शक्ति मुकद्दमों में बन गए मुखबिरों और पुलिस केथे। काकोरी की डकैती असफल हो जाने मामूली अफसरों के वध में ही नष्ट होती रही थी। दिल्ली में निश्चय किया गया कि अब केवल ऐसे ही मामलों को हाथ में लिया जायेगा जिनका सार्वजनिक राजनैतिक महत्व हो सके। इस उद्देश्य से सब से पहले चुना गया साइमन कमीशन को। इस कमीशन के आने पर बम्बई में मजदूरों की जो व्यापक हड़ताल हुई थी, उससे अपना सहयोग प्रकट करना दल आवश्यक समझता था।
      दिल्ली की बैठक में यह भी स्पष्ट रूप से निश्चिय कर लिया गया कि भविष्य में हमारा कार्यक्रम किसी एक व्यक्तिगत नेतृत्व में नहीं चलेगा। दल के सब हथियार और प्राप्त होने वाला धन केंद्रीय समिति के हाथ में रहेंगे। कोई भी कार्य करने से पहले सात आदमियों की केंद्रीय समिति में उस पर विचार किया जायेगा।
      इस बैठक में विजय कुमार सिन्हा और भगत सिंह पर अंतरप्रांतीय संबंध बनाए रखने का उत्तारदायित्व दिया गया। सुखदेव को पंजाब, शिव वर्मा को युक्तप्रांत, कुंदनलाल को राजपूताना, फणींद्रनाथ को बिहार का प्रतिनिधि संगठनकर्त्ता स्वीकार किया गया। हथियारों और कोष की कमी के कारण यह निश्चय किया गया कि हथियार और कोष पूर्णत: केंद्रीय-समिति के हाथ में रहें। कोष वास्तव में कुछ था ही नहीं। हथियार भी कम ही थे, इसलिए यह तय पाया कि जिस प्रांत में जब आवश्यकता हो हथियार भेज दिए जायें और फिर लौटा कर केंद्रीय समिति में दे दिए जाएं।
      इससे पूर्व के दल में से चंद्रशेखर आजाद ही ऐसे व्यक्ति थे जो ज्येष्ठ होने का दंभ छोड़ कर नए लोगों के साथ नये ढंग से काम करने के लिए तैयार थे। आजाद के अतिरिक्त उस समय नये लोगों में से शस्त्राों का उपयोग भी कोई दूसरा व्यक्ति ठीक से नहीं जानता था; इसलिए सशस्त्रा या सैनिक कार्य का नेता उन्हीं को बनाकर एच.एस.आर.ए. का 'कमांडर-इन-चीफ' निश्चिय किया गया था।
      लाहौर में नौजवान भारत सभा को यह निर्देश दिया गया था कि नगर में साइमन कमीशन के आने पर जहां तक हो सके सभी राजनैतिक दलों को मिलाकर विकट से विकट प्रदर्शन किया जाये। नौजवान भारत सभा की पुकार थी कि-''अंग्रेज सरकार को हमारे भाग्य निर्णय का अधिकार नहीं है। वे कमीशन भेजने वाले कौन होते हैं?'' लाहौर में साइमन कमीशन के बहिष्कार के प्रदर्शन का नेतृत्व सभा ही कर रही थी। सब ओर मुकम्मिल हड़ताल, काले झंडे और नंगे सिरों की बाढ़-सी नजर आती थी। इतने बड़े प्रदर्शन से प्रभावित हो कर कांग्रेस के नेताओं को प्रदर्शन में आगे चलना ही पड़ा।
   वृध्द पंजाब केसरी लाला लाजपत राय को भीड़ के धक्कों से बचाये और धूप में उनके सिर पर छतरी संभाले नौजवान उन्हें स्टेशन तक ले गए। भीड़ के आगे नौजवानभारत सभा के लोग थे। उन्होंने पुलिस की धमकियों के बावजूद कमीशन के लिए रास्ता देने से इनकार कर दिया। वे कमीशन को काले झंडे दिखा देने और 'साइमन गो बैक' की पुकार उनके कानों तक पहुंचा देने पर तुले हुए थे। पुलिस ने लाठी चार्ज किया। सभा के लोगों से जहां तक बन पड़ा जनता को पीछे हटने से रोके रहे। जनता के हृदय में अंग्रेजी सरकार के प्रति प्रबल घृणा उत्पन्न कर सकने का यह अच्छा अवसर था।
   लालाजी को घेरे इस मोर्चें को टूटते न देखकर समीप खड़े पुलिस सुपरिटेंडेंट स्काट ने इस टोली पर हमला करने की आज्ञा दी। डी.एस.पी. सांडर्स स्वयं छोटी लाठी हाथ में लेकर सिपाहियों के साथ इस टोली पर टूट पडा। उसकी एक लाठी से लालाजी के सिर पर तनी हुई छतरी टूट कर उनके कंधे पर भी चोट आ गयी।
   'मोरी दरवाजे' की विराट सार्वजनिक सभा में सुखदेव और मैं भीड़ के पीछे खड़े थे। हम लोगों से कुछ ही कदम दूर डिप्टी पुलिस सुपरिटेंडेंट नील खड़ा था। लालाजी ने अपनी ओजपूर्ण वक्तृता में सुबह की घटना की निंदा करते हुए कहा-''जो सरकार निहत्थी प्रजा पर इस तरह के जालिमाना हमले करती है, उसे तहजीबयाफ्ता (सभ्य) सरकार नहीं कहा जा सकता और ऐसी सरकार कायम नहीं रह सकती। मैं आज चैलेंज देता हूं कि इस सरकार की पुलिस ने मुझ पर जो बार किया है। वह एक दिन इस सरकार को ले डूबेगा।'' अंग्रेज अफसरों को लक्ष्य कर लालाजी ने अपनी बात अंग्रेजी में दोहराई-'' प् कमबसंतम जींज जीम इसवूे ेजतनबा ंज उम ूपसस इम जीम सेंज दंपसे पद जीम बविपिद व िजीम ठतपजपेी तनसम पद प्दकपंण्''
    17 नवंबर, 1928 को लालाजी का देहांत हो गया। जनता में विदेशी शासन विरोधी भावना और लालाजी के लिए आदर का प्रवाह उमड़ रहा था। लालाजी की अर्थी के जुलूस में लाख-डेढ़ लाख आदमी रहे होंगे। डॉक्टर गोपीचंदजी भार्गव तो विलख-विलख कर रोये। लाहौर में ऐसा कोई भी हिंदू-मुसलमान न होगा जिसने मातम न मनाया हो। लाहौर के सभी स्वयं-सेवक दलों ने शव-यात्राा के प्रबंध में साथ दिया था परंतु हम लोगों की सेवा समिति पर बोझ अधिक था। प्राय: दस बजे सुबह अर्थी की यात्राा लालाजी के बंगले से आरंभ हुई और चार मील दूर रावी नदी के तट पर पहुंचते-पहुंचते संध्या के पांच बज गए। अर्थी पर फूलों का बोंझ इतना था कि बीसियों आदमी उसे उठा कर चल रहे थे और दस-पांच कदम पर आदमी बदलते जाते थे।
      संध्या का अंधेरा हो गया था परंतु विराट चिता के समाप्त होने 
में अभी घंटों की देर थी। भीड़ प्राय: छंट चुकी थी। डाक्टर भार्गव आंसू बहाते हुए बोले कि वे चिता कोअकेला नहीं छोड़ना चाहते। उन्हें आशंका थी कि कोई चिता का अपमान न कर जाय। मैंने उन्हें सांत्वना दी कि मैं रात यहीं रह जाऊंगा।
      भगवती भाई ने मुझ से पूछा, यहां सख्त सर्दी में गीली रेत पर कैसे रह जाओगे? वे यह भी देख रहे थे कि मैं कितना थका हुआ था।
      ''अब तो कह चुका हूं।'' लाचारी दिखाई। 

      ''अच्छा।'' कहकर वे चले गए। मैं अकेला ही चिता से कुछ दूर बैठा रहा। हल्की-हल्की चांदनी फैल रही थी। रावी की तीखी ठंडी हवा चलने लगी थी। चिता से हल्का सेंक भी आ रहा था। आंखों में नींद भर रही थी।
      प्राय: एक घंटे के बाद अचानक अपने नाम की पुकार सुनी। आवाज पहिचानी, भगवती भाई थे। वे दूर रेती के पार खड़े पुकार रहे थे। पास जाकर देखा कि वे टांगे पर एक खाट और बिस्तर ले आए हैं और एक कटोरदान में कुछ खाने के लिए भी।
      हम लोगों ने चिता से कुछ दूर खाट पर बिस्तरा 

लगाया और दोनों एक साथ सो गए। सुबह सूर्य की किरणों से 

नींद खुली। नींद ऐसी आई थी कि करवट भी नहीं बदली। भगवती भाई के साथ खाट पर सोने से करवट लेने की गुंजाइश भी नहीं थी। फारारी के दिनों में हम लोगों को हफ्तों जाड़ों में एक कम्बल लेकर इसी प्रकार सोना पड़ा परंतु तब खाट भी नहीं थी।

17 दिसम्बर, 1928 को अपराहन में राजगुरु और भगत सिंह ने गोलियां मारकर सांडर्स को नरक रवाना कर दिया। साथ ही एच.एस.आर.ए. ने हत्या की जिम्मेदारी स्वीकार की और दीवारों पर इस्तहार लगाकर कहा गया 'नौकरशाही सावधान! सांडर्स की मृत्यु से लाला लाजपत राय की हत्या का बदला ले लिया गया।
      सबसे कठिन समस्या थी भगत सिंह को लाहौर से बार निकालने की। यह कल्पना कर लेना कठिन नहीं था कि जिस भगत सिंह के विषय में पुलिस को याें ही सदा संदेह बना रहता था, उसकी लम्बी फरारी और सांडर्स-वध की घटना के बाद पुलिस उसकी खोज में कितनी परेशान होगी। भगत सिंह केश कटा कर वेश तो बदल चुका था लेकिन इससे चेहरे में कितना परिवर्तन आ सकता था? फर्न पर गोली चलाते समय उसे तीन-चार सिपाहियों ने अच्छी तरह देखा भी था। भगत सिंह के पुराने रूप से लाहौर की खुफिया पुलिस खूब परिचित थी ही। दाढ़ी उसने साफ करा दी थी जरूर परंतु उसकी दाढ़ी बहुत घनी तो कभी थी भी नहीं।
      सुखदेव लगभग रात के आठ बजे आया। उन दिनों भाभी संस्कृत पढ़ा करती थीं। पड़ोस की एक और महिला के साथ मिल कर उन्होंने एक अध्यापक नियुक्त कर लिया था। भाभी को एक ओर बुला कर सुखदेव ने प्रश्न किया- ''कहीं बाहर जा सकती हो?''
      ''कहां?...क्या काम है? ''

      ''इस घटना के एक आदमी को बचा कर लाहौर से निकालना है। उसकी मेम साहब बन कर साथ जाना होगा,... खतरा है। सोच लो, गोली चल सकती है।'' सुखदेव भाभी की ओर घूरता रहा।
      ''कौन आदमी है?'' भाभी ने जानना चाहा।

      ''कोई भी हो।'' जैसी की सुखदेव की आदत थी।

      ''चली जाऊंगी।''

      ''वह रात में यहां ही रहेगा।...इस पढ़ाई को समाप्त कर दो।''

      ''अच्छा।''
      कुछ देर बाद सुखदेव के साथ एक लंबा सा जवान ओवरकोट, हैट पहने एक नौकर के साथ आ गया। भाभी ने उन्हें कमरे में बैठा दिया, स्वयं भी बैठी और सुखदेव की ओर देखती रहीं। अपरिचित आदमी की ओर क्या देखतीं?
      सुखदेव ने उस आदमी की ओर संकेत कर भाभी से पूछा-''इसे पहचानती हो!''
      भाभी ने देखा; जरा ध्यान से देखा-''भगत?''
      भगत सिंह और सुखदेव हंस पड़े।


      सुबह तड़के पांच-छह बजे कलकत्ता मेल से चलने की बात 

थी। भगत सिंह ओवरकोट का कालर उठाये, हैट माथे पर खींचे 
और अपना चेहरा गोद में लिए 'शची' के सिर की आड़ में किये रेलवे प्लेटफार्म पर पहुंचा। भगवती भाई का लड़का शचींद्र कुमार वोहरा, जो अब इंजीनियर है उस समय तीन बरस का था। भाभी भी यथाशक्ति चेहरे पर पाउडर मले और अपने सब से ऊंची एड़ी के जूते से खट-खट करती साथ थीं। भगत सिंह की जेब में भरा हुआ पिस्तौल था। राजगुरु नौकर के वेश में साथ था। उस की कमर पर भी भरा हुआ पिस्तौल बंधा था। पुलिस को संदेह हो जाता तो गोली जरूर चलती... शची और भाभी दोनों का क्या होता?(क्रमशः)
भगतसिंह के सर्वाधिक प्रसिद्द चित्र के आधार पर बना यह रेखाचित्र वीरेंद्र संधू की पुस्तक 'युगद्रष्टा भगत सिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे', (ज्ञानपीठ प्रकाशन, 1968) के एक संस्करण के आवरण में प्रकाशित हुआ था। उसके बाद वह अनगिनत पर्चों और पुस्तिकाओं में छपा।

मंगलवार, 29 मार्च 2016

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -5-यशपाल


" भगत सिंह विचार माला " by V.C.

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -5-यशपाल


   भगत सिंह के विक्षुब्ध रहने का कारण सरदार किशन सिंहजी का 

व्यवहार था। भगत सिंह काफी समय दिल्ली और कानपुर रह आया था। 
उस का यह प्रवास गुप्त ही था। पिता के बार-बार पूछने पर भी उसने उस प्रवास के रहस्य उन्हें नहीं बताये थे परंतु उसके लक्षणों से इस फरारी का कारण भांप लेना कठिन नहीं था। सरदारजी को यह आशंका बनी हुई थी कि लड़का फिर किसी समय अंतर्धान हो जा सकता है। बीच-बीच में दो-चार दिन के लिए वह उड़ भी जाता था। सी.आई.डी. उस का पीछा कर रही थी। यह देख कर सरदारजी और भी चिन्तित थे। वे सोचते ही नहीं बल्कि भगत सिंह को समझाते भी थे कि सी.आई.डी. का सन्देह दूर करने के लिए उसे अक्ल से काम लेना चाहिये!
      भगत सिंह को घर पर बांध लेने का उपाय जो सरदारजी ने सोचा सो कोई नया नहीं था; वही पुराना तरीका कि लड़के का विवाह कर दिया जाये। एक अच्छे अमीर देहाती सिख परिवार में उन्होंने लड़की भी निश्चित कर ली थी। विवाह के लिए भगत सिंह को तैयार न देख कर सरदारजी और भी क्रुध्द और चिंतित रहने लगे।
      सरदारजी ने विवाह के प्रति आपत्तिा का कारण पूछा। भगत सिंह ने उत्तार दिया कि वह जब तक आर्थिक रूप से अपने पांव पर खड़ा न हो जाए शादी करना ठीक नहीं समझता। सरदार किशन सिंह जी ने उत्तार दिया, ''तू हमें ही रास्ता बताना चाहता है? विवाह कर ले और अपने पांव पर खड़े होने की कोशिश भी कर। हम मना करते हैं? विवाह हो जाने से तुझे कौन झंझट हो जाएगा? ''
      भगत सिंह ने अपनी उम्र कम होने का भी एतराज किया। सरदारजी ने उत्तर दिया, ''और सब बातों के लिए जो बुर्जुर्ग बनता है, बस शादी के लिए ही कमसिन है? शादी हो जाने दो। बहू को घर तभी बुलाना जब जरूरत जान पडे।'' सरदारजी को इस विवाह से काफी बड़े दहेज की भी आशा थी। लड़की वाले बात पक्की कर लेना चाहते थे। इसलिए सरदारजी भगत सिंह के इनकार के कारण मानसिक ज्वर की-सी अवस्था में दिखाई देने लगे।
      बहुत दबाव पड़ता देखकर भगत सिंह ने एतराज किया कि वह शादी करेगा ही तो पढ़ी लिखी लड़की से करेगा। उसे यह मालूम हो चुका था कि सरदारजी ने जो लड़की तलाश की है, वह गांव के अच्छे  बड़े जमींदार की लड़की है। गांव में लड़कियों का स्कूल कहां थे? बहुत होगा, लड़की कुछ गुरुमुखी जानती होगी। भगत सिंह ने जिद्द की कि वह कम से कम मैट्रिक पास लड़की से शादी करेगा। इस उत्तार से सरदार जी और भी बौखला उठे।
      भगत सिंह को कभी-कभी तो दल के काम-काज से भी घर से बाहर रह जाना पड़ता था और कभी-कभी पिता के सदा बिगड़ते ही रहने के कारण भी वह घर न जाता। मेरे यहां या भगवतीचरण के यहां टिक जाता और कभी कहीं और। इस बात से सरदारजी और भी अधिक विक्षिप्त हो जाते। हम सभी सरदारजी के निरंतर क्रोध के कारण उनसे डरने लगे। कभी हम लोग आपस में मजाक ही कर रहे होते और वे अचानक आ जाते तो चुप हो जाते। बुजुर्गों के सामने सभी तरह की बातें भी तो नहीं की जा सकतीं। सरदारजी अनुमान कर लेते कि यह लोग राजनैतिक-षडयंत्रा की बातें कर रहे थे, मुझे देख कर चुप हो गए हैं। उनका क्षोभ और क्रोध और भी बढ़ आता।
      सरदारजी मच्छीहट्टा में मेरी जगह पर कभी नहीं आए थे। एक दिन पूछते-तांछते हाथ में लाठी लिए, वे मेरे यहां आ पहुंचे। उनका चेहरा देख कर ही भांप गया कि वे बहुत ही नाराज और बिगड़े हुए थे। आते ही क्रोध भरी आत्मीयता में उन्होंने मुझे सम्बोधन किया-''तू भगत सिंह को समझाता क्यों नहीं? आखिर वह शादी क्यों नहीं करता? अभी तुम लोग बड़े भारी क्रांतिकारी ब्रह्मचारी बने फिरते हो, चार दिन बाद गलियों में लहंगे सूंघते फिरोगे।'' उन्होंने कुछ ऐसे विकट शब्दों और उपमाओं का प्रयोग किया उन्हें दोहराया नहीं जा सकता।
      मैंने भगत सिंह की ओर से सफाई दी कि शादी करने से तो वह इन्कार 
नहीं करता। उसे पढ़ने-लिखने का शौक है। वह चाहता है कि लड़की पढ़ी-
लिखी हो।
      सरदार जी उबल पड़े-''पढ़ी-लिखी लड़की में कुछ और बढ़ जाता है क्या? पढ़ी-लिखी औरत से क्या पढ़े-पढ़ाये बच्चे होते हैं?''
      उनका क्रोध बढ़ता ही गया, वे साफ-साफ गालियां देने लगे...''तू और जयचंद्र दोनों बहुत कमीने हो। अपने आपको बहुत चालाक समझते हो। खुद तो तुम लोग नौकरी कर रहे हो, दूसरों को बिगाडते फिरते हो। तू उसे समझा नहीं सकता?''
      उस समय यदि मैं उनसे यह कह देता कि मैं उसे क्या समझाऊं वही मुझे समझा रहा है, तो जाने वे मुझे क्या-क्या सुना देते। इसलिए मैं यही कहता रहा कि मैं तो उसे हमेशा समझाता रहता हूँ कि घर का काम देख, ''देखिये, मैं तो नौकरी कर रही रहा हूं ''
      मेरे अज्ञान प्रकट करने पर सरदारजी बिगड़ उठे-''उसने तो मुझसे यही कहा था कि तेरे यहां रह जाता है।'' एक जिम्मेवार व्यक्ति का नाम लेकर वे बोले- ''... ने भी भगत को आज सुबह तेरे साथ देखा था, तुझे पता नहीं तो किसे पता है?''...उन्होंने एक अच्छी जोरदार गाली दे कर कहा-''मैं तेरे बाप की जगह हूं। तू मुझे चराता है बदजात!''
      कसम खाकर विश्वास दिलाया कि भगत मेरे यहां आज नहीं आया बाजार में मिला था। इस पर उन्होंने पूछा-''सुखदेव कहां रहता है?''
      यह बताना मुश्किल था क्योंकि सुखदेव उन दिनों 'कन्हैयालाल बिल्डिंग' में जयगोपाल के साथ एक कमरा लेकर अप्रकट रूप से रह रहा था। मैंने सरदारजी को टालने के लिए दो-चार जगहों के नाम बता दिए कि हो सकता है वहां कहीं हो।
      सरदारजी ने उन सभी जगहों का चक्कर लगाया। बदकिस्मती से इन्हीं में से एक  जगह भगत सिंह मिल गया।
      भगत सिंह ने आकर क्रोध में इस मुलाकात का जो हाल सुनाया तो मेरी ग्लानि का अन्त न रहा। सौ कसमें खाकर उसे यकीन दिलाया कि मुझे विश्वास था कि तुम आजकल वहां नहीं आते होगे। इसीलिए मैंने उन जगहों का नाम ले दिया था। भगत सिंह ने घुटनों, कोहनियों और कन्धों पर लाठी की मार के चिह्न दिखाये और फिर हंस-हंस कर उन मौलिक गालियों के नये-नये समास बताये जिनका आविष्कार सरदारजी ने उस पर अपना क्षोभ प्रकट करने के लिए किया था।
      1927 में लाहौर में दशहरे के अवसर पर एक बम विस्फोट हुआ था। यह किसी विकृत मस्तिष्क की करतूत थी। घनी भीड़ में बम विस्फोट होने से बहुत लोग जख्मी हो कर अस्पताल में भरती हुए  थे। मैं सेवा समिति की ओर से इन लोगों की सेवा-सुश्रुषा के लिए अस्पताल जाता रहता था। दशहरे की भीड़ में हिंदुओं की संख्या तो ज्यादा थी ही, इसीलिए हिंदू भाइयों ने कल्पना कर ली कि यह बम विस्फोट मुसलमानों की शरारत थी।
अक्तूबर 1926 में लाहौर में दशहरा के अवसर पर बम फटा। इस बम कांड के सिलसिले में भगत सिंह को 29 मई 1927 को पहली बार गिरफ्तार किया गया। पाँच सप्ताह तक हिरासत में रखने के बाद 4 जुलाई 1929 को साठ हज़ार रुपए की ज़मानत पर रिहा गया गया। हाथ-पैरों में हथकड़ी-बेड़ी व चारपाई पर बिना पगड़ी के खींचा गया भगत सिंह का यह चित्र उसी समय का है।

      पुलिस ने संदेह में कुछ आदमियों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें से एक भगत सिंह था दूसरा हमारे कालिज का विद्यार्थी बाबूसिंह। पुलिस ने भगत सिंह को प्राय: दो सप्ताह हवालात में रखा। वकीलों की ओर से उसे अदालत में पेश किए जाने की मांग की जा रही थी। पुलिस कोई मामला न गढ़ पाई थी। उसे अदालत में पेश किये बिना ही जमानत पर छोड़ दिया गया। जमानत की रकम थी चालीस हजार रुपए। इस भारी जमानत पर होने के कारण, जामिनों को संकट में न डालने के लिए भगत सिंह को अपने घर में कैद हो जाना पड़ा। वह कहीं भी आता-जाता तो पुलिस के खुफिया उसके पीछे छाया की तरह लगे रहते। खुफिया पुलिस को चकमा दे देना तो मामूली बात थी किंतु  चकमा देने का अर्थ होता, उस विषय में पुलिस के सन्देह को मजबूत कर देना।

      मैंने डाक्टर गोपीचंद भार्गव की मार्फत पंजाब असेंबली में भगत सिंह 
को बिना कारण बताये जमानत पर रखकर परेशान करने के संबंध में प्रश्न का नोटिस दिला दिया। डाक्टर साहब को मुझ पर पूरा विश्वास था ही। उनके प्रश्न वगैरह मैं ही बना दिया करता था। चिकित्सा और कांग्रेस के दूसरे कामों से उन्हें रात के एक-एक बजे तक फुरसत न मिल पाती थी। असेंबली में प्रश्न का नोटिस देने पर भगत सिंह की जमानत वापस कर दी गई। कुछ दिन तो भगत सिंह साधु बना घर पर टिका रहा परंतु फिर ऐसा अन्तर्धान हुआ कि 1929 मार्च में केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने और परचा बांटने के बाद ही गिरफ्तार हो कर प्रकट हुआ।
      भगत सिंह भी अपनी कल्पना में एक दुबली-पतली, पीली-पीली सी लड़की को जो उन दिनों एक कालिज में पढ़ रही थी, अपने मन में 'मेवाड़पतन' की 'मानसी' बनाये बैठा था। मुझे अब 'मेवाड़पतन' की कहानी तो याद नहीं पर भगत सिंह की 'मानसी' याद है। इस 'मानसी' ने भगत सिंह से कोई प्रतिज्ञा भी नहीं की थी। यह केवल भगत सिंह के मन का पढ़ी-लिखी, सुसंस्कृत दिखाई देने वाली लड़की के प्रति स्वत: आकर्षण मात्र था। अस्तु, जब 'मानसी' ने देश के प्रति उत्सर्ग को अपने मतलब की बात न समझ कर एक समृध्द नौजवान के शिष्ट वेश और व्यवहार के प्रति आकर्षित होकर उससे सगाई कर ली तो भगत सिंह की कल्पना के आदर्शों की मीनार भी ठसक गई। वह भी दो-चार दिन लंबी-लंबी सांसें लेकर अपने घर के इक्के में, घोड़ों के बीमार हो जाने के कारण ऊंट के दूध के कलसे शहर में पहुंचाता हुआ क्रांति की बात सोचने लगा।(क्रमशः)

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -4-यशपाल

" भगत सिंह विचार माला " by V.C.
(6) 

( क्रांतिकारी और महान कथाकार स्व.यशपाल)



भगवतीचरण वोहरा नेशनल कालेज में हम लोगों से दो वर्ष ऊपर थे। यों तो भगत सिंह का डीलडौल भी दो-तीन वर्ष में काफी पनप आया था परंतु भगवतीचरण की बराबरी वह भी न कर सकता था। कद छह फुट से कुछ ही कमदोहराकसरतीचुस्त बदन। गोलसा गंभीर चेहरागंदमी रंगजरा भारी होंठआंखें चश्मे के शीशों के पीछे छिपी हुर्इं। उनका जन्म लाहौर में ही हुआ था परंतु वंशक्रम से वे गुजराती ब्राह्मण थे।
भगतसिंह के बचपन का चित्र, उम्र 11-12 वर्ष

      भगवतीचरण अपने आप को पंजाबी ही कहते थे और इतना शुध्द पंजाबी उच्चारण करते थे कि उनके बहुत अंतरंग लोगों के सिवा दूसरे शायद ही जानते हों कि उनके पूर्वज गुजरात से आगरा और आगरे से लाहौर में आकर बसे थे।
      इन दिनों गुप्त संगठन के कार्य का क्षेत्रा तैयार करने के लिए पंजाब में एच.आर.ए. का परचा आया तो जयचंद्रजी के सूत्राों से था परंतु रखा गया था गवालमंडी में भगवतीचरण के मकान पर ही। इसे बांटने के आयोजन में भी भगवतीचरण ने पूरा सहयोग दिया था।
      'नौजवान भारत सभाकी स्थापना के लिए विचार और सूत्रपात से ही हम सब ने सहयोग दिया। उसके मुख्य सूत्राधार भगत सिंह और भगवतीचरण ही थे। भगत सिंह जनरल सेक्रेटरी और भगवतीचरण प्रोपेगेण्डा सेक्रेटरी थे। इनके साथ सार्वजनिक क्षेत्र से प्रमुख सहयोग देने वाले लोग थेसाथी धन्वन्तरी और एहसान इलाही। कुछ ही दिन में कांग्रेस में समाजवादी प्रवृत्ति रखने वाले सभी नौजवान 'नौजवान-भारत-सभाके सहयोगी बन गए। यह संगठन भारतवर्ष के भिन्न-भिन्न प्रांतों में किस प्रकार फैल गया थावह सभी लोग जानते हैं।
      'नौजवान भारत सभाका कार्यक्रम गांधीवादी कांग्रेस की समझौतावादी नीति कीआलोचना कर के जनता को उस राजनैतिक कार्र्यक्रम की प्रेरणा देना और जनता में क्रांतिकारी आंदोलन के लिए सहानुभूति उत्पन्न करना था। सभा को उस समय के पंजाब कांग्रेस के वामपक्षी नेताओं उदाहरणत: डाक्टर सत्यपालडाक्टर किचलूकेदारनाथजी सहगलपिंडीदासजी आदि का भी सहयोग मिल रहा था। लाला लाजपत रायजी इस समय पूर्णरूप से हिंदू महासभाई हो चुके थे और डाक्टर गोपीचंद भार्गव उनके अनन्य समर्थक बनकर राजनैतिक महत्व प्राप्त कर रहे थे। भगवतीचरणभगत सिंहसुखदेव,धन्वन्तरीएहसान इलाहीपिंडीदास सोढ़ी और मैं सभा का कार्र्यक्रम निश्चित करने से लेकर जलसा करने के लिए दरियां ढोने और बिछाने का सभी काम करते थे। हम लोगों के फरार हो जाने के बाद हमारे कालेज के विद्यार्थी रामकृष्णधन्वन्तरी और एहसान इलाही सभा को चलाते रहे।
      प्रकट आंदोलन से क्रांति का जितना प्रचार संभव थानौजवान भारत सभा कर रही थी। यह सभा की ही हिम्मत थी कि 1914 के लाहौर षडयंत्र के मुकदमे में हंसते-हंसते फांसी चढ़ जाने वाले 18 वर्ष के नवयुवक कर्तारसिंह की बरसी 'ब्रैडला हालमें सार्वजनिक रूप से मनाकर उसके चित्र का उद्धाटन किया गया था। यह उत्सव एक प्रकार से नौजवानों को सशस्त्र क्रांति की चेष्टा में सम्मिलित होने का निमंत्रण ही था। उत्सव का अनुष्ठान भी बड़े हृदयस्पर्शी ढंग से किया गया। भगत सिंह ने शहीद कर्तारसिंह का एक छोटा सा चित्र खोज निकाला था। उस चित्र के आधार पर कर्तारसिंह का एक बहुत बड़ा चित्र भगवती भाई ने अपने खर्च पर बनवाया था। चित्र पर खूब श्वेत खद्दर का एक पर्दा लटका दिया गया था। दुर्गा भाभी और सुशीला दीदी ने अपनी उंगलियों से रक्त निकाल कर इस पर्दे को छीटों से रंग दिया था। इस अवसर पर मुख्य भाषण भी भगवतीचरण ने ही दिया था।
      नौजवान भारत सभा का क्रांतिकारी रूप उसके सामाजिक प्रयत्नों से भी प्रकट था। उग्र राजनैतिक व्याख्यानों के अतिरिक्त हम लोग सामाजिक भोजों का भी आयोजन करते थे। इन भोजों की विशेषता बहुमूल्य और स्वाद व्यंजन नहीं थी। इन भोजों में टाट बिछा लिए जाते। पत्तलों और सकोरों में खिचड़ी या चने का पुलाव और मठा ही परोसा जाता था। सभी संप्रदायोंवर्णों और जातियों के लोगों को इनमें सम्मिलित किया जाता था और सब लोग एक साथ बैठ कर एक दूसरे के हाथ से परोसा हुआ भोजन करते थेएकअवसर पर तो कुछ दुस्साहसी नवयुवकों ने हलाल (मुसलमानों की सांप्रदायिक रूढ़ि के अनुसार काटे हुए पशु) और झटके (सिखों की सांप्रदायिक रूढ़ि द्वारा काटे हुए पशु) का मांस एक ही देग में पका कर गोश्त रोटी का भोज कर डाला जिसमें मुसलमानहिंदू और सिख नौजवान काफी संख्या में सम्मिलित थे। यही गनीमत रही कि रूढ़िवाद से परेशान यह नवयुवक गाय और सुअर तक नहीं पहुंचे।
      'नौजवान भारत सभासांप्रदायिक एकता को राजनैतिक कार्यक्रम का बहुत ही महत्वपूर्ण अंग समझती थी परंतु इसकी दृष्टि में सांप्रदायिक एकता का मार्ग कांग्रेस के कार्यक्रम की तरह सभी सांप्रदायिक धारणाओं को फुसलाना नहीं था। अर्थात् हम लोग 'अल्ला हो अकबर', 'सत श्री अकालऔर'वंदे मातरम्के नारे एक साथ नहीं लगाते थे। इसके केवल दो नारे थे-'इंकलाब जिंदाबादऔर 'हिंदुस्तान जिंदाबाद'। इसके अतिरिक्त सभा रूढ़िवाद और सांप्रदायिकता के अंधविश्वास को दूर करना भी आवश्यक समझती थी। सभा की ओर से सार्वजनिक व्याख्यानों का भी प्रबंध किया जाता थाजिन में अन्धविश्वास और शब्द प्रमाण के आधार पर सांप्रदायिक आदर्शवाद का निराकरण करके वैज्ञानिक भौतिकवाद का परिचय लोगों को दिया जा सके। 'सर्वेंट्स आफ पीपुल्स सोसायटीके प्रिन्सिपल छबीलदासजी का इस विषय में काफी सहयोग रहता था। अनेक मुसलमान साथी फजलमन्सूर और एहसान इलाही भी खूब सरगरमी से भाग लेते थे।
      एक दिन ऐसे ही व्याख्यान में छबीलदासजी के बाद मन्सूर या एहसान इलाही इस्लाम की अंधविश्वास की अतार्किक बातों का जिक्र कर रहे थे। हम यह उचित समझते कि प्रत्येक सम्प्रदाय की आलोचना यथासंभव उसी संप्रदाय के व्यक्ति से कराई जाय। उस समय श्रोताओं में से एक मुसलमान छुरा खींच बैठा कि वह वक्ता को कतल करेगा। इस धर्मांध भलेमानुस को पकड़ कर एक ओर ले जाकर समझाया गया कि इससे पहले वक्ता ने भी तो यही सब कहा था तब आप कैसे चुप बैठे थेउसने आवेश में उत्तर दिया कि अगर कोई हिंदू या ईसाई इस्लाम की आलोचना करता है तो मैं सांप्रदायिक सहिष्णुता के नाते सहने के लिए तैयार हूं परंतु मुसलमान के मुख से इस्लाम की आलोचना सुनने के लिए तैयार नहीं हूं। उस समय व्याख्यान को समाप्त कर देना उचित न जंचा। इसका अर्थ होता भविष्य में हिंदू धर्मांध लोगों को भी इस प्रकार का फसाद खड़ा करने के लिए प्रोत्साहन देना। खैरजैसे तैसे व्याख्यान पूरा हुआ। गड़बड़ की रिपोर्ट पुलिस में करने का परिणाम हमारे जलसों पर रोक लग जाना ही होता। इसलिए उन्हें चुनौती दी-''तुम्हें जो करना हैकर लो। अगर तुम अपने विश्वास के लिए मरने-मारने के लिए तैयार हो तो हम लोगों के भी दो-दो हाथ हैं और हमारी रोटी कौवा उठा कर नहीं ले जाता।'' सभा की चर्चा वास्तव में गुप्त क्रांतिकारी आंदोलन के प्रकट रूप की ओर ध्यान दिलाने के लिऐ ही है क्योंकि आंदोलन की जड़ गुप्त क्रांतिकारी आंदोलन में ही थी। दल सभा द्वारा ही अपने ध्येय को एक सीमा तक जनता के सामने रख सकता था।
      सन् 1926 की बात हैहम लोगों का जो कुछ थोड़ा बहुत संगठन उस समय तक बन पाया था उसके सब सूत्र जयचंद्रजी ही संभाले थे। दल नौजवान भारत सभा बनाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकता था। हम लोगों को उससे कोई संतोष नहीं था। भगवतीचरण कुछ समय सभा के काम में लगातेकुछ समय हिंदी साहित्य सम्मेलन में सहायता देते। इन कामों से संतोष न होता तो नौकरी तलाश करने की चेष्टा भी करते। भगत सिंहसुखदेव और भगवतीचरण भाई भी बेचैनी अनुभव कर रहे थे। यह लोग क्रियात्मक कदम उठाना चाहते थे परंतु जयचंद्रजी व्यापक भौगोलिक और ऐतिहासिक शिक्षा और संगठन बढ़ाने और उसे फिर से छांट देने से आगे बढ़ना नहीं चाहते थे।
      भगत सिंह ने पंजाब से दिल्ली और कानपुर जाकर दूसरे प्रांत के लोगों से संपर्क बनाने का निश्चय किया। भगत सिंह की लाहौर से बाहर जाने की इच्छा का एक कारण सरदार किशन सिंहजी की नाराजगी भी था। भगत सिंह घर के काम-काज की उपेक्षा कर केवल राजनैतिक कार्य में लगा रहता था। इस कारण उसके पिता उससे चिढे रहते और उस पर अपना अंकुश बढ़ा रहे थे।
      भगत सिंह पिता को कोई सूचना दिए बिना लाहौर से दिल्ली पहुंच गया। दिल्ली से प्रकाशित'अर्जुनमें पांव जमाने के लिए वह जयचंद्रजी का सिफारिशी पत्र लेता गया था। सिफारिश भी कैसी?कोई आदमी लगभग मुफ्त काम करने के लिए तैयार हो तो उसका स्वागत कौन नहीं करेगा। वह कुछ दिन 'अर्जुनअखबार में काम करता रहा। अपनी निष्ठा और कठिन परिश्रम से उसने पंडित इंद्रजी विद्यावाचस्पति का विश्वास शीघ्र प्राप्त कर लिया था। अर्जुन में काम करते समय एक रोज अनुवाद करने के लिए एक तार दिया गया। तार था, 'चमनलालएडिटर डिफंक्ट नेशन ऐराइव्ड एट लाहौर'। भगत सिंह ने उसका अनुवाद किया, 'डिफंक्टनेशन के संपादक मिस्टर चमनलाल लाहौर पहुंच गए।यह अनुवाद अर्जुन में छप भी गया।
      इन्द्रजी ने अनुवाद की ओर भगत सिंह का ध्यान दिलाया परंतु भगत सिंह को इसमें कोई भूल दिखाई न दी। उसका ख्याल था कि चमनलाल 'डिफंक्टनेशननामक पत्र के सम्पादक हैं। इंद्रजी ने उसे डिफंक्ट शब्द का अर्थ डिक्शनरी में देखने का आदेश दिया और भगत सिंह को मालूम हुआ कि 'डिफंक्ट'का अर्थ 'बंद हो चुका हुआपत्र है। ऐसी ही एक और मजेदार बात भगत सिंह के उस समय के अंग्रेजी ज्ञान के बारे में याद है। सिनेमा देखने का शौक भगत सिंह को काफी था परंतु टिकट के लिए दामों की कठिनाई रहती थी। पिता से सिनेमा के लिए तो क्या जूता तक खरीदने के लिए दाम मांगना उसे गंवारा न था। घर के काम-काज के बारे में जब वह उन की बात मानने को तैयार नहीं था तो खर्चा कैसे मांगता। समस्या का एक ही हल था कि जरूरतों की परवाह न करना और कभी साथियों की जेब में पैसा देख लेने पर उसका उपयोग कर लेना। एक दिन जयदेव गुप्त ने उसे सिनेमा दिखाने का वायदा कर लिया था। तब हम लोग सिनेमा चवन्नी के टिकट में देखते थे परंतु चवन्नी का ही काफी मूल्य था! दो आने में तो घी चुपड़ी हुई तन्दूर की दो बड़ी-बड़ी रोटियां और मामूली छुंकी हुई दाल तरकारी का भोजन हो जाता था।
      भगत सिंह को घी-दूध का शौक भी कम न था। अनारकली में कालू दूध-दही वाले के यहां सरदार किशन सिंहजी का उधार हिसाब चलता था। भगत सिंह जब चाहता वहां से दही-दूध खा पी सकता था और उसके साथ जो कोई होउसे भी खिला-पिला सकता था परंतु किसी तन्दूर या तबे पर उधार नहीं था। भगत सिंह सांडा(घर) जाने से कतराता था। रामकृष्ण ने ग्रेजुएट हो कर मोहनलाल रोड पर एक सुथरा सा होटल खोल लिया था। हम सब लोग खाने के लिए वहीं पहुंचने लगे थे। अपने लोगों में से कोई किसी समय खाना खा रहा हो तो वह होटल में चला आता। बिना किसी भूमिका के एक कुर्सी उठाकर वह सामने बैठ जाता और चपाती के बड़े से टुकड़े का दोना बना कर दाल के ऊपर तैरता हुआ घी एक ही बार में समेट मुंह में रख लेता। अगर राजाराम शास्त्री होटल में दिखाई दे जायें तो भगत सिंह जरूरी काम छोड़ करभूख न होने पर भी उन की कटोरी में से सब घी जरूर पी जाता। 'देखोअरे देखोक्या कर रहा है। अरे देखो तो इस जाट को'! शास्त्री जी हाथ फैलाये सहायता के लिए दुहाई देते रह जाते।
      पंजाब में घी अधिक मात्रा में खाने का कुछ चलन था। उन लोगों को वह पच भी जाता था। एक दिन भगत सिंह से कुछ आवश्यक बात करते-करते मैं उसके गांव सांडा पहुंच गया भोजन का समय था। उसकी मां ने कहा पहले खा लो! एक बड़ीसी कटोरी में लौकी की तरकारी में घी इतना था कि भगत सिंह भी घबरा गया। वह झुंझला उठा-''मां इतना घी भी कोई  खा सकता हैतुम तो तरकारी को बरबाद कर देती हो।''
      भगत सिंह की मां ने गाल पर उंगली रख मुझ से शिकायत की, ''देख तो इस लड़के कोकुछ खाता ही नहीं। जरा सा घी भी इसे नहीं भाता। तभी तो सूख कर कांटा हो रहा है।''

      भगत सिंह के लमतडंग़हृष्ट-पुष्ट शरीर की ओर संकेत कर मैंने पूछा, ''अगर यह कांटा है तो फिर मैं तो हूं ही नहीं।''
      मां को हंसी आई परंतु स्नेह की गाली दे मुझे डांट भी दिया, ''धत् नालायक। बात कहनी भी नहीं आती। बच्चों को ऐसे नजर लग जाती है।'' अस्तु !
      मैं भगत सिंह के उस समय के अंग्रेजी ज्ञान का उदाहरण दे रहा था। जयदेव गुप्त ने संध्या समय भगत सिंह को साथ सिनेमा ले चलने का वायदा किया था। भगत सिंह जहां भी थासिनेमा न चूकने के लिए भागा हुआ मकान पर लौट आया देखा कि जयदेव निश्चित लेटा हुआ कोई उपन्यास पढ़ रहा है। भगत सिंह ने अपने पांव से जयदेव के पांव पर ठोकर दे कर चेतावनी दी-''अबे उठसिनेमा का वायदा भूल गया?''
      जयदेव ने लेटे ही लेटे चिढ़ कर कड़े स्वर में डांट दिया, ''अजीब जाहिल हैमेरी तबीयत खराब है इसे सिनेमा की पड़ी है। अभी डाक्टर के यहां से लौट रहा हूं। वह देख दवाई!'' उसने मेज़ पर पड़ी बोतल की ओर संकेत कर दिया।
      भगत सिंह ने नरमी से पूछा-''क्या हो गया तुझे?''
      जयदेव ने गंभीर मुद्रा में उत्तर दिया, ''डाक्टर ने डिस्पेंसिया बताया है।''
      अंग्रेजी का यह शब्द सुनकर भगत सिंह चुप रह गया। सिनेमा न जा कर सकने की कलख तो मन में थी ही। चुपचाप डिक्शनरी उठा एक कुर्सी पर बैठ गया और डिस्पेंसिया शब्द का अर्थ ढूंढने लगा। अर्थ देख कर उसने डिक्शनरी मेज पर पटक दी। उठ कर एक लात और जयदेव की कमर पर जमायी और बांह से खींच उसे खड़ा कर दिया, ''बदमाश! खा खा कर बदहजमी कर ली है। काहिल पड़ा सो रहा हैऔर ऊपर से दवाई ठूंसेगा?... डिस्पेंसिया कह कर डराना चाहता है? ''
      जयदेव उलझता रहा कि उसका मन ठीक नहीं है परंतु भगत सिंह की दलील थी-''तुझे बदहजमी है। शाम को तुझे खाना नहीं चाहिएइसलिए तेरे पास जो पैसे हैं वह मुझे सिनेमा देखने के लिए दे दे। तुझे न जाना होमत जा।''
      भगत सिंह के तत्कालीन अंग्रेजी ज्ञान की चर्चा इसलिए की है कि अपने ही स्वाध्याय से उसने अंग्रेजी पर इतना अधिकार कर लिया था कि 'असेंबली बमकांडके समय उसने जो पर्चें फेंके थे और ट्रिब्यूनल के सामने अंग्रेजी में जो लिखित बयान उसने दिए थेउनकी भाषा की प्रशंसा प्राय: सभी लोगों ने की थी। कुछ लोगों ने कल्पना कर ली थी कि वे बयान भगत सिंह के नहीं वकील के लिखे हुए थे। इस कल्पना में कोई तथ्य नहीं है। अध्ययन भगत सिंह का स्वभाव था। जब भी देखोउस के लंबे बेडौल कोर्ट की जेब में कोई न कोई पुस्तक रखी ही रहती थी। निरानी सड़क पर चलता हो तो चलते-चलते भी पढ़ता रहता था।
      दिल्ली और कानुपर में भगत सिंह ने कैसे दिन बिताये होंगेयह अनुमान उसके लाहौर लौटने पर उसकी सूरत देखने से ही हो जाता था। सिर के केश पगड़ी की जगह एक मामूली से अंगौछे में ही लिपटे हुए थे। शरीर पर केवल खद्दर का बंद गले का कोट। वही कोट जो लाहौर से जाते समय वह कमीज के ऊपर पहने था। अब कमीज नदारद थी। पायजामे की जगह लुंगी थी। पायजामे का आसन और कोट की आस्तीनें फट जाने पर पायजामे की टांगें कोट की आस्तीनों की जगह जोड ली थी। किसी तरह शरीर ढंका हुआ था। परंतु कोट की जेब में कोई पुस्तक जरूर थी। कानपुर में भगत सिंह ने पहले कुछ दिन अखबार बेच कर ही निर्वाह किया। फिर स्वर्गीय गणेशशंकरजी विद्यार्थी का विश्वास पा कर वह 'प्रताप'में काम करने लगा। कानपुर में रहते समय वह युक्तप्रांत के तत्कालीन क्रांतिकारी विद्यार्थियों शिव वर्माजयदेव कपूर और विजयकुमार आदि के सम्पर्क में आ गया परंतु क्रांतिकारी नेताओं तक उस की पहुंच न हो पायी थी।
      युक्तप्रांत में क्रांति के काम को विस्तार से चलाने की योजना बनाई जा रही थी परंतु प्रश्न था साधनों का। गुप्त कार्यक्रम के लिए सार्वजनिक रूप से धन एकत्र नहीं किया जा सकता था। प्रभावशाली लोगों को विश्वास में लेकर बात की भी जाती तो उन्हें यह केवल लड़कपन जंचता था कि पन्द्रह बीस पिस्तौल ले कर ब्रिटिश साम्राज्यशाही से लड़ा जाय। धन की समस्या हल करने के लिए युक्तप्रांत के क्रांतिकारी दल 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन सेना' (एच.आर.ए.) ने लखनऊ जिले में काकोरी के समीप राजनैतिक डकैती करके रेलवे का सरकारी खजाना लूट लिया था। इस प्रयत्न के दो प्रयोजन थेएक तो दल के आर्थिक संकट का उपाय करना और दूसरा विदेशी सरकार की शक्ति को चुनौती देकर उसकी प्रतिष्ठा पर चोट करना।
      क्रांतिकारी दल ने चलती गाड़ी को रोक कर जब खजाना लूटा तो मुसाफिरों से कह दिया गया था, 'हम जनता के जानोमाल पर हाथ नहीं डालेंगे केवल सरकारी खजाना लेंगे।काकोरी-डकैती तो हो गई परंतु उसमें विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई। कुछ ही दिन बाद पुलिस को कुछ सुराग मिल जाने से गिरफ्तारियां भी शुरू हो गईं। कानपुर में भगत सिंह से संपर्क रखने वाले लोगों ने उसे परामर्श दिया कि तुम संदिग्ध अवस्था में हो। पुलिस अन्धाधुन्ध गिरफ्तारियां कर रही है। इस लपेट में तुम्हारा भी आ जाना संभव है। तुम कानपुर से खिसक जाओ।
      भगत सिंह कानपुर से दिल्ली लौट गया। कानपुर में पाये हुए सूत्रों के आधार पर वह दिल्ली में संगठन जमाने की चेष्ठा करने लगा। पंजाब में दल पर जयचंद्रजी अपना कब्जा जमाए हुए थे परंतु हो कुछ नहीं रहा था। भगत सिंह पंजाब से बाहर था। सुखदेव खिन्न हो लायलपुर चला गया था। भगवतीचरण भारतवर्ष के क्रांतिकारी आंदोलनों का एक श्रृंखलाबध्द इतिहास लिखने की चेष्टा करने लगे थे। भगवतीचरण के व्यक्तिगत आकर्षण के कारण हम लोग प्राय: 'ग्वाल मंडीमें उनके मकान 'शिव निवासमें आते जाते रहते थे। भगवतीचरण का मकान सुघड़ गृहस्थ का घर था। बेमतलब शोरशराबा उन्हें पसंद नहीं था। यों कभी कह देने पर या स्वयं उनके निमंत्रण दे देने पर वहां बढ़िया खाना मिल जाता था परंतु वहां उस समय तक भगत सिंह के मकान की तरह धर्मशाला न बन पाई थी।
      भगवतीचरण और दुर्गा भाभी का विवाह काफी कम उम्र में ही हो गया था। विवाह के समय भगवती भाई की उम्र तेरह-चौदह की और भाभी की दस ग्यारह की रही होगी। दोनों ही परिवारों के बुजुर्ग पुरानी परिपाटी के थे। उन्होंने अपनी संतानों का विवाह करके अपना संतोष कर लिया थाजैसे छोटे लड़के-लड़कियां गुड्ड़े-गुड़िया का विवाह कर लेते हैं। यह भाग्य की बात थी कि दोनों ही ढंग के आदमी निकले। भाभी जब ससुराल आईं तो शायद रामायण और प्रेमसागर बांच लेती होंगी। भगवती भाई ने कभी स्वयं पढ़ाकर और कभी टयूटर रख कर उनकी पढ़ाई का क्रम सदा जारी रखा। उनके पुत्र शची का जन्म 1925 में हुआ था। इसके बाद वे किसी रूप में पढ़ाई लिखाई में लगी ही रहीं।
      दुर्गा भाभी उस समय तक प्रकट रूप से सार्वजनिक कार्य में नहीं आई थीं। शायद अपने पति के लक्षण देखकर समझ चुकी थीं कि अपने जीवन के लिए वे पति और पैतृक जायदाद  किसी भी चीज पर भरोसा नहीं कर सकेंगी। वे पंजाब यूनिवर्सिटी की हिंदी की परीक्षायें एक के बाद एक पास करती रहीं।1926 में पंजाब यूनिवर्सिटी की 'प्रभाकरकी परीक्षा हम दोनों ने साथ-साथ ही दी थी। यह परीक्षा पास करके वे लाहौर के 'महिला कालेजमें हिंदी की लेक्चकर बन गई थीं। सार्वजनिक आंदोलत में सामने कभी न आने पर भी राजनैतिक कार्य और विशेष कर क्रांतिकारी गुप्त संगठन के प्रति उनका अनुराग गूंगे के गुड़ जैसा था। वास्तविकता यह थी कि वे मन ही मन ईर्ष्या से चुप रह जातींक्योंकि भगवती भाई सुशीला दीदी को कवित्यागी और प्रतिभा संपंन समझ कर उनसे तो क्रांति की बातें करते परंतु भाभी को 'देहाती बहूसमझ इन बातों की चर्चा नहीं करते थे। भाभी होंठ दबायें सिर खुजा कर रह जातींदेखा जायगा!(क्रमशः)



यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -3-यशपाल

" भगत सिंह विचार माला " by V.C.
(5) 


यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -3-यशपाल
( क्रांतिकारी और महान कथाकार स्व.यशपाल)


नेशलन कालिज में भाई परमानंद प्राध्यापक थे। वे पढ़ने-लिखने में ही लगे रहते। एक प्रकार से भाई परमानंद ही लाला लाजपत रायजी की ओर से नेशलन कालिज के व्यवस्थापक थे। भाई परमानंदजी की स्थिति के व्यक्ति का केवल कुर्ता-धोती पहनना और वह मोटे और घर के धोये, बिना स्त्री किए विशेष ध्यान आकर्षित करता था। उन्हें साधारणत: लोग त्याग मूर्ति भाई परमानंदजी कहते थे।

भगतसिंह असहयोग आन्दोलन के दौरान लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित लाहौर के नेशनल कालेज के छात्र थे। कालेज के ड्रामा सोसाइटी के इस समूह चित्र में वे दाहिने से चौथे स्थान पर पर खड़े हैं।


भाई परमानंदजी को पायजामा और कोट पहनने वाले विद्यार्थियों के प्रति खासी वितृष्णा थी। जो विद्यार्थी जुल्फें रखकर तेल और कंघी का व्यवहार करते थे, उन्हें तो वे बिल्कुल जनखा ही समझते थे। वे कालेज में इतिहास पढ़ाते थे और साधारणत: विद्यार्थियों में राष्ट्र सेवा की भावना को उत्साहित भी करते थे। जिनमें ऐसी रुचि देखते उन्हें प्रोत्साहित भी करते। इस प्रसंग में यदि किसी ऐसे विद्यार्थी का नाम उन्हें सुझाया जाता जो धोबी के धुले साफ कपड़े पहनने का शौक रखता हो, तो वे उसकी ओर से तुरंत ही निराशा प्रकट कर देते।

नेशनल कालेज के प्रिंसिपल आचार्य जुगल किशोरजी थे। आचार्यजी 1951 में उ.प्र. कांग्रेस के प्रधान और तदनंतर श्रमविभाग के मंत्री हो गए थे। उ.प्र. कांग्रेस के प्रधान आचार्यजी कुछ ही समय पहले इंग्लैंड में शिक्षा के लिए कई बरस रहकर लौटे थे। उस समय उन्हें हिंदुस्तानी की अपेक्षा अंग्रेजी बोलने में ही अधिक सुविधा होती थी। कालेज में शिक्षा का माध्यम हिंदुस्तानी हिंदी और अंग्रेजी था। पुस्तकें सब अंग्रेजी में ही थीं। परंतु अध्यापक लोग हिंदुस्तानी में भी समझाने की चेष्टा करते थे। केवल आचार्यजी और प्रोफेसर जी.सी.मेहता हिंदुस्तानी नहीं बोल पाते थे। आचार्यजी का दृष्टिकोण मुख्यत: अध्ययन को प्रोसाहन देने का ही था। उन्होंने कालेज में गांधी आश्रम की पध्दति को लागू करने का यत्न नहीं किया। वे प्राय: विद्यार्थियों के अध्ययन को उचित धाराओं की ओर प्रेरित करने की चेष्टा भी करते।

कॉलेज के प्रोफेसरों की विचारधारा का प्रभाव विद्यार्थियों के विचारों पर काफी पड़ा। इनमें प्रो. जयचंद्र विद्यालंकार का नाम विशेषत: उल्लेखनीय है। जयचंद्रजी प्राय: ही विद्यार्थियों की तर्क और जिज्ञासा की प्रकृति को उकसाते रहते थे। वे भारतीय इतिहास और राजनीति के अध्यापक थे। उनकी चेष्टा रहती थी कि विद्यार्थी इतिहास को श्रुति और स्मृति मानकर केवल विश्वास द्वारा ही न अपनाते चले जाएं बल्कि तर्क और खोज के दृष्टिकोण से उसका अध्ययन करें। उनकी कक्षा में अनेक प्रकार के विषयांतरों पर भी वाद-विवाद हो जाता था, जैसे आस्तिकता-नास्तिकता, आत्मवाद और भौतिकवाद। उनका दृष्टिकोण विद्यार्थियों को बहुत ही सुलझा हुआ जान पड़ता था। इसलिए जिज्ञासु और अध्ययनशील विद्यार्थियों का एक गिरोह उनके चारों ओर इकट्ठा हो गया था जिसे भविष्य में तैयार हो जाने वाले क्रांतिकारी दल की पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। उस गिरोह में से अधिकांश विद्यार्थी छंट गए और कुछ नए भी आ मिले।

नेशनल कालेज में अधिकांश विद्यार्थी राजनीति, अर्थशास्त्रा और इतिहास की शिक्षा ले रहे थे। यों फारसी और संस्कृत भी पढ़ाई जाती थी। फारसी पढ़ने वाले केवल दो या तीन विद्यार्थी थे और संस्कृत पढ़ने वाले पांच या छह। कुछ पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि भगत सिंह संस्कृत पढ़ता था। संस्कृत में भगत सिंह की रुचि का कारण उस समय बहुत हदतक उसके परिवार की आर्यसमाजी रुचि समझी जा सकती थी। डी.ए.वी. स्कूल में संस्कृत अनिवार्य होने के कारण उसने कुछ संस्कृत वहां भी पढ़ी थी। साहित्य की ओर उसकी प्रवृत्ति तो थी ही।

भगत सिंह मैट्रिक पास किये बिना और काफी समय गुरुद्वारा आंदोलन वगैरह में लगा कर हमारा सहपाठी बना था। इस कारण वह पढ़ाई में, खास कर पाठयक्रम में दूसरे साथियों से अपने आपको कुछ पिछड़ा हुआ अनुभव कर रहा था। कक्षा में प्रोफेसरों से उसे डांट-फटकार भी काफी सुननी पड़ती थी। भगत सिंह के स्वभाव में सब से बड़ी बात समय और परिस्थिति के अनुकूल सट जाने की थी। पढ़ाई की अपनी कमी को पूरा करने के लिए वह विशेष यत्न कर रहा था परंतु कक्षा में हम लोग यदि गुट बांधकर कोई शरारत करते तो वह पीछे नहीं रहता था। यह शरारतें अधिकतर होती थीं हमें भारतीय इतिहास पढ़ाने वाले प्रोफेसर सोंधी और प्रोफेसर मेहता की अंग्रेजी की कक्षा में। प्रोफेसर सोंधी कुछ औंघाते-औंघाते अपना लेक्चर देते थे। कोई भी सवाल कर देने पर उलझ बैठते-''तुम लिंक आफ थौट को डिस्टर्ब कर देते हो।'' उनका एक बार यह कहना था कि हम लोग अप्रासंगिक प्रश्नों की झड़ी लगा देते। परिणाम होता कि सोंधी साहब कक्षा छोड़ देते और हम लोग दंगे के लिए बाहर निकल जाते।

प्रोफेसर मेहता पढ़ाते बहुत लगन से थे परंतु उनका हिंदुस्तानी का ज्ञान बहुत परिमित था, हिंदुस्तानी शब्दों का उच्चारण और भी विचित्र। किसी भी शब्द का हिंदुस्तानी पर्यायवाची शब्द उनसे पूछ लेना मजाक आरंभ करने के लिए काफी था और फिर ठेठ पंजाबी का कोई ऊटपटांग शब्द उन्हें सुझा देना। दूसरे विद्यार्थियों के खिलखिला पड़ने पर मेहता साहब परेशान हो जाते और सबसे पहले झंडासिंह की ओर संकेत कर हुक्म दे देते-'गेट आउट आफ दि क्लास।' उसके बाद मेरी बारी आती फिर सुखदेव की फिर भगत सिंह की और दूसरे दो-एक साथियों की।

पंडित चेतरामजी शर्मा हमारे हिंदी के पहले अध्यापक थे और संगीत के विशेष अनुरागी। पंड़ित जी बहुत ही गंभीर थे और छंदों की व्याख्या करते समय उनके मात्रा और अनुपात इत्यादि को प्राय: संगीत के क्रियात्मक प्रदर्शन से समझाने की चेष्टा करते। पंडितजी को संगीत का ज्ञान गहरा होने पर भी कंठ काफी बोझल था। हम लोग संगीत की शुध्दता क्या जानें? हंसी रोकना कठिन हो जाता परंतु पंडितजी की शिष्टता का लिहाज इतना था कि अपने ऊपर जब्र करना पड़ता। हमारी मुस्कानों और आंखों में भरी शरारत की पंडितजी विशेष चिंता भी न करते थे।


प्रोफेसर जयचंद्रजी विद्यालंकार की कक्षा में किसी शरारत के लिए अवसर नहीं रहता था। उनकी बात की उपेक्षा करने में अपना ही नुकसान था। कोई भी बेतुका प्रश्न सुनकर जयचंद्रजी एक क्षण के लिए चुप हो जाते और फिर प्रश्न का उत्तर से आंखें मिला पूछ लेते-'प्रस्तुत विषय से तुम्हारे प्रश्न का क्या संबंध है?' इसलिए कोई वास्तविक समस्या होने पर ही प्रश्न किये जाते थे। जयचंद्रजी का पाठय विषय तो राजनैतिक सिध्दांत और शासन-व्यवस्था संबंधी ऐतिहासिक विश्लेषण था परंतु बातचीत प्राय: सत्याग्रह-आंदोलन पर भी चल जाती थी। और विद्यार्थी उसकी विफलता पर मनन किए बिना न रह सकते थे। अपने देश के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति की लगन मन में रखने वाले विद्यार्थियों के लिए इस मनन का एक ही परिणाम हो सकता था कि वे अपने राष्ट्र की राजनैतिक समस्या के समाधान का कोई दूसरा मार्ग सोचें।

सत्याग्रह-आंदोलन की विफलता के अनुभवों और दूसरे मार्ग की खोज की इच्छा के समय हम लोगों के हाथ कौन-सा साहित्य पड़ा? डैनब्रीन की-'माई फाइट फार आइरिश फ्रीडम', मैजिनी और गैरबाल्डी की जीवनियां, फ्रांसीसी राज्यक्रांति का इतिहास, बोल्तेर और रूसो के रूढ़िवाद विरोधी क्रांतिकारी विचार, रूसी क्रांतिकारियों की जीवनियां, 'वीराफिगन' 'क्रौपोटकिन' आदि और इस के साथ-साथ भारत में सत्याग्रह से भिन्न देश की स्वतंत्राता के लिए किये गए प्रयत्नों का परिचय जिनमें सान्याल दादा की आप बीती 'बंदी जीवन' प्राथमिक पुस्तक के रूप में थी और फिर 'रौलेट कमेटी की रिपोर्ट।'

रौलेट कमेटी ने अपनी रिपोर्ट रौलेट बिल बनाया जाने 
की आवश्यकता प्रमाणित करने के लिए लिखी थी। इस में भारत में हुए सशस्त्रा क्रांति की चेष्टा के प्रयत्नों का काफी ब्योरेवार वर्णन है। रिपोर्ट इन प्रयत्नों को अपराध प्रमाणित करने के लिए लिखी गई थी परंतु लेखकों का दृष्टिकोण ऐतिहासिक या वास्तविकता का यथासंभव यथार्थ (आक्जेक्टिव) चित्राण करना था। इस पुस्तक को पढ़ कर हम लोगों पर यह प्रभाव नहीं पड़ा कि भारतीय क्रांतिकारी अपराधी थे। हम इस परिणाम पर पहुंचे कि उन्होंने अपनी परिस्थितियों में एक स्वाभाविक मार्ग का अवलम्बन किया था और उस प्रयत्न के लिए संभावना का बहुत विस्तृत क्षेत्र है। हमें उन कार्यों और मार्ग का भी कुछ परिचय मिल गया।

यह याद नहीं कि किस साथी ने इन पुस्तकों को पढ़ने की बात मुझे सुझाई। इनमें से अधिकांश पुस्तकें तो कालिज के छोटे से पुस्तकालय में ही थीं। शेष कहां से कैसे आ जाती थीं, यह अब याद नहीं। उस समय उस की खोज करने की आवश्यकता भी अनुभव न हुई थी। यह भी नहीं कहा जा सकता कि इन पुस्तकों को हम कुछ लोग ही, भगत सिंह और सुखदेव जैसे ही पढ़ते हों। सभी विद्यार्थी इन पुस्तकों को पढ़ते थे।

एक दिन मैं और भगत सिंह रावी नदी में नौका खेने का अभ्यास करने गए थे। हम दोनों ही थे, तीसरा कोई साथ नहीं था। यह तो याद नही कि प्रसंग कैसे चला परंतु एकांत देखकर मैंने भगत सिंह से एक बात पूर्ण विश्वास से कह डाली- 'हम लोग अपना जीवन देश के लिए अर्पण करने की प्रतिज्ञा कर लें।'

भगत सिंह ने सहसा गंभीर हो कर अपना हाथ मेरी ओर बढ़ा दिया- 'मैं प्रतिज्ञा करता हूं।'

हाथ मिलाने के बाद हम दोनों ही कुछ देर तक चप्पू चलाना छोड़ निश्चल बैठे रहे। उस समय सूर्यास्त हुआ ही था, आकाश पर लाली थी। अंधेरा होता देखकर हम लोगों ने नाव किनारे लगाकर मांझी को सौंप दी। लौटते समय भी हम लोग चुप ही रहे, बोले नहीं। यह बात इतनी भावुकता से हुई थी कि उस की याद बनी है।


सन् 1925 की एक घटना याद है। पंजाब में हिंदी साहित्य 
सम्मेलन की नयी-नयी स्थापना हुई थी। उर्दू प्रधान लाहौर में 
सम्मेलन की ओर बहुत कम लोगों की रुचि थी। नेशनल कालेज के कुछ विद्यार्थी और संस्थाओं के हिंदी अध्यापक ही प्राय: उस में योग देते। सम्मेलन ने किसी एक विषय पर सर्वोत्ताम निबन्ध लिखने के लिए पचास रुपये के पुरस्कार की घोषणा की थी। मैंने निबंध लिखा था। कई महीने तक परिणाम की प्रतीक्षा करने पर पता लगा कि पुरस्कार किसी व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता क्योंकि निर्णायकों ने तीन निबन्धों को एक ही कोटि का ठहराया था। यह भी मालूम हो गया कि उन तीनों में से एक निबंध मेरा था। दूसरे दो निबंध लेखकों के नाम जानने के लिए खोज की तो पता लगा कि दूसरा निबंध भगत सिंह का था और तीसरा जयचंद्रजी की मां जी का था।
लिखने की ओर भगत सिंह की प्रबल रुचि थी। मैं केवल हिंदी में लिखता था। भगत सिंह उर्दू में भी लिखता था। कुछ दिन बाद स्थानीय उर्दू पत्रों में उस की लिखी छोटी-छोटी चीजें प्रकाशित भी होने लगी थीं। अपने विचारों के प्रचार के लिए अथवा सन 1924-25 में प्राय: सोई राष्ट्रीय भावना को जगाने के लिए, नेशनल कालिज के विद्यार्थियों ने नाटकों का माध्यम भी अपनाया था। इस चेष्टा के दोनों ही कारण थे, नाटक खेलने की इच्छा और नाटक को अपने विचारों के प्रचार का साधन बनाना भी। किसी लेखक का 'महाभारत' नाटक था। उसके वार्तालापों में जगह-जगह परिवर्तन करके हम लोगों ने अपने लिए उपयोगी बना लिया। इस नाटक का नाम रखा गया था 'कृष्ण विजय'। व्यंजना से अंग्रेजों को कौरव और देश भक्तों को पांडव बना लिया था। इस में कुछ गाने, विशेष कर प्रहसन भाग में, सम्मिलित कर लिए थे। इन में से एक गाना था-'कदे तूं बी हिंदिया होश सम्भाल ओ' (ऐ हिंद कभी तू भी होश सम्भाल! तेरा घरबार विदेशी लूट ले गया और तू भी बेखबर सो रहा है। ओ लूटने वाले हमारे साथ ज्यादतियां न कर। हम तेरी सब चालकियां समझ चुके है... इत्यादि।
यह गाना सरदार अजीत सिंह के एक पुराने गीत-'पगड़ी सम्भाल ओ जट्टा' (अरे बेखबर किसान तेरे सिर की पगड़ी उतरी जा रही है) के भाव को लेकर बनाया गया था। सरदार अजीतसिंह के उस गीत को सरकार ने गैरकानूनी कर दिया था। हमारे नाटकों के ऐसे विदेशी सरकार-द्रोही भागों को भी गैरकानूनी करार दे दिया गया था। कुछ दिन हम लोगों को नाटक खेलने का खूब शौक रहा। दो नाटक हम लोगों ने लाहौर में खेले। फिर 'गुजरांवाले' में प्रांतीय-कांग्रेस की कांफ्रेंस के अवसर पर भी 'भारत दुर्दशा' नाटक खेला।
नाटकों का आरंभ किया गया था देहरादून में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के मौके पर 1924 में राजा भोज के कवि दरबार का नाटक खेलने से। राजा भोज के दरबार में आधुनिक हिंदी कवियों की उपस्थिति की कल्पना जयचंद्रजी के मस्तिष्क की उपज थी। इसमें मैंने राजा भोज की भूमिका की थी। भगत सिंह भी 'भारत दुर्दशा' आदि कई नाटकों में अभिनय करता रहा। नाटकों के कार्यक्रम में साथी झंडासिंह (अब सरदार जसवंत सिंह) धर्माभिलाषी, हुंडू और बलदेव जो अब रिजर्व बैंक आफ इंडिया में बहुत जिम्मेवार पद पर हैं, बहुत अग्रणी भाग लिया करते थे। इन दिनों भगत सिंह और सुखदेव प्राय: कालेज से गायब रहने लगे थे। भगत सिंह का व्यवहार मजाक के अलावा कामकाज के बारे में कुछ सख्त हो गया था ।
इस समय दल के संगठन की बात कुछ-कुछ स्पष्ट होने लगी थी। हिंदुस्तानी प्रजातंत्र दल(एच.आर.ए.) का एक परचा लाहौर में बलराज के दस्तखत से बांटा गया था। इस खतरनाक परचे का सफल बंटवारा संगठन और आयोजन के बिना नहीं हो सकता था। मैं सहयोग तो दे रहा था परंतु स्कूल में अपनी नौकरी और परीक्षा की तैयारी छोड़ने के लिए तैयार न था। सत्याग्रह के मार्ग की विफलताओं पर हम लोगों की बहस उन दिनों बहुत चलती थी और प्रजातंत्र और समाजवादी पध्दति की भी चर्चा काफी जोर से होती थी। समाजवाद की ओर ध्यान जाने का सीधा-सादा कारण था, रूस के संबंध में साहित्य हाथ आना। 'तिलक स्कूल आफ पालिटिक्स' और 'सरवेंट्स आफ पीपुल्स सोसाइटी' के अतिरिक्त लाला लाजपत रायजी ने अपने पिता के नाम पर 'द्वारकादास पुस्तकालय' की भी स्थापना की थी। इस पुस्तकालय में राजनैतिक पत्र-पत्रिकाएं और सामयिक साहित्य काफी मात्रा में आता था।

कानपुर के प्रसिध्द समाजवादी राजाराम शास्त्री इस पुस्तकालय के पुस्तकालयाध्यक्ष थे। हम लोग प्राय: समवयस्क थे और शास्त्रीजी को हमारे विचारों से भी सहानुभूति थी इसीलिए 'द्वारकादास पुस्तकालय' हम लोगों का अच्छा-खासा अब बन गया था। इस पुस्तकालय में सुविधा यह थी कि आस-पास अनेक कालेजों के बोर्डिंग होने के कारण यहां विद्यार्थी राजनैतिक अथवा क्रांतिकारी साहित्य में रुचि रखते थे।

शास्त्रीजी स्वभाव से विनोदी, मिलनसार और कद में काफी छोटे हैं। इसलिए प्राय: उनके ना ना करते रहने पर भी लाइब्रेरी से जरूरत के मुताबिक पुस्तकें झपट ली जा सकती थीं। कभी रात-बिरात घूम-घाम कर आने पर उनकी खाट या कमरे पर भी जबर्दस्ती दखल कर लिया जा सकता था। एच.आर.ए. का परचा बांटने में भी शास्त्राीजी का पूरा सहयोग था।(क्रमशः)